”दु‍निया खतों की” अनन्या गौड़

“ख़त को खोलो तो भाई ..ऐसे कब तक देखते रहोगे ।”मनन ने गुमसुम बैठे चिंतन से कहा ।
तू जा यहाँ से .. मेरा दिमाग़ मत खा ।संयत स्वर में बोला चिंतन ।अरे भाई तुम भी न ! तुम से तो भली पत्थर की मूरत! लाओ मुझे दो ये ख़त ! हाथों से ख़त छीनते हुए बोला मनन । देख चुपचाप दे इधर ! वरना…”वरना क्या भाई ! ऐसा कह मनन मुस्कुराते हुए, ख़त को हवा में लहराने लगा ।”अरे यार ! अब बस भी कर ।मुझे मालूम है ख़त में क्या लिखा होगा इसीलिए नहीं खोल रहा हूँ यह ख़त । तू भी न एक बड़ी आफत है सच्ची में !” लगभग झल्लाते हुए बोला चिंतन । “क्या हुआ तुम दिनों को ? क्यों चिल्ला रहे हो ? “रसोईघर में रोटियाँ बनाती हुई माँ हाथ में बेलन थामे वहाँ आ पहुँची।
“वाह माँ! सही टाईम पर एंट्री ली है आपने ! लगाओ एक बेलन इस मनन को । देखो न कब से मुझे परेशान किये जा रहा है ! “भाई बता दूँ माँ को..अगर आप कहो तो..”होंठों पर शरारती हँसी बिखेरते हुए बोला मनन ।”वो माँ दरअसल..” तभी दरवाज़े की घण्टी बजी और माँ बात को बीच ही में छोड़कर हॉल में चली गयी ।”बहुत मार खाएगा तू मेरे हाथ से ” एक घूसा मनन की पीठ पर मारते हुए बोला चिंतन ।
“चिंतन… मनस्वी आई है बेटा ” माँ ने तभी आवाज़ लगाई  । “ओये होए..ख़त देने वाली खुद हाज़िर ! क्या बात है भाई! जाइये जाइये..”मनन चिंतन को छेड़ते हुए बोला ।उसके हाथ से ख़त छीन कर चिंतन बाहर की ओर दौड़ा । देखा गुलाबी परिधान में मनस्वी हल्की मुस्कान बिखेर रही थी ।”कब जा रही हो अजमेर ” चिंतन ने बुझे स्वर में पूछा ।”तुम्हें नहीं मालूम ! “”क्या ?””ख़त नहीं पढ़ा मेरा ?””.पढ़ने की हिम्मत ही नहीं हुई । और क्या होगा ख़त में तुम्हारे यहाँ से जाने की ख़बर ही लिखी होगी…जो कि एक महीने पहले ही तुम मुझे बतला ही चुकी हो। ” ” इतने दिनों से मुझे मिले नहीं थे..इसीलिए ख़त भेजा था.. बुद्धू राम ! पापा का ट्रांसफर रुक गया है..मैं नहीं जा रही अब । यही तो लिखा था ख़त में…। एक ही साँस में बोल गयी मनस्वी

अनन्या गौड़
अहमदाबाद

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