जीवन ‘लघुकथा’ डॉ.सरला सिंह

डा0 सरल सिंह

तेजी से पटरियों के बीच दौड़ती एक लड़की ट्रेन के किनारे पटरियों पर पड़े  पानी के बोतल उठा उठा कर अपने बोरे में भर रही थी ,कई बार गिर पड़ती ,फिर उठती संभलती और आगे बढ़ जातीा उम्रबमुश्किल सात आठ साल की रही होगी ।नाम मिनी और फिर मीनू ।सोनू को अपनी तरफ के बोतल उठाते देख चिल्ला पड़ी “सोनू तू इधर मत आ , इधर मैं बोतल उठारही हूँ ।” “तो क्या मैं भी तो वही कर रहा हूँ।”सोनू भी झल्ला उठा । उसके साथ ही कुछ और भी बच्चे थे वे भी पानी के बोतलों को बीनने में लगे थे । सोनू ,रीना,मोनू सभी बच्चे अधिक से अधिक बोतल पाना चाहते थे ।

 बच्चों को देखकर यही लगता है कि क्या मंत्रियों को ,सरकार को इन बच्चों के बारे में कोई भी जानकारी नहीं कि इनके रहने और पढ़ाई की व्यवस्था कर सकें । बच्चे खाली पड़े पानी के बोतलों को बड़ेही जतन से उठाते और अपने अपने बोरों मेंभर लेते थे । मीनू सबसे आगे भागती और फिर उतना ही गिरती भी ।  इन्हे वे बीना आंटी के पास पहुँचाते थे । बीना आंटी एक ऐसी महिला थी जो बच्चों से ट्रेन के किनारे पटरियों पर गिरे पानी के बोतल बिनवाकर मंगाती ,उसके बदले में बच्चों को कुछ पैसे दे देती थी । फिर उन्हीबोतलों में जो सही होते साधारण पानी भरकर मिनरल वाटर कहकर बिकवा देती । इस काम के लिए भी उसके पास कुछ बच्चे थे । बीना आंटी एक एक बच्चे को उसका काम बाँट कर रखती थी । मीनू सबमे सबसे छोटी थी अतः उससे थोड़ा कम कड़ाई करती । “अरी मीनू आज तो तेरे बोतल कम हैं।”
हाँ आंटी कम है,पर कल और ज्यादा लाऊँगी देख लेना । पर आज के पैसे मत काटना ,माँ की तबियत ठीक नहीं है ,दवा लानी है।”मीनू एकबार में ही कह गयी । बीना ने भी उसे पैसे तो दे दिये पर इस चेतावनी के साथ कि कल के हिसाब से काट लेगी । मीनू सात साल की उम्र में ही मानों कितनी बड़ी हो गयी थी ।
डॉ.सरला सिंह
दिल्ली
9650407240

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