गीत-डा मोहन तिवारी आनंद

कैसी भी मजबूरी आवे
फिर भी कभी धैयॆ न खोना।
दुनिया कुछ भी कहे किन्तु तुम
सदा प्यार की फसलें बोना।।

स्वारथ अहंकार विष बेलें
हरदम रहना इनसे दूर।
आज आदमी अंधा होकर
भटका सत्कर्मों से दूर।।
तुम तो सतपथ के रंगों में
रंग डालो हर कोना-कोना।

किसने कब किसको पहचाना
किसने किसकी पीड़ा जानी।
कहने को सब सगे बने पर
हर सम्बंध हुआ बेमानी।।
एक आँख से खुशी झलकती
एक आँख से फर्जी रोना।।

आओ मेरे पास तुम्हारी
मैं खुशियों से झोली भर दूँ।
मेरी सुनो करो तुम ऐसा
विपदाओं की छुट्टी कर दूँ।।
कभी किसी के बहकावे मैं
मत अपनाना रोना धोना।

कैसी भी मजबूरी आवे
फिर भी कभी धैयॆ न खोना।
दुनिया कुछ भी कहे किन्तु तुम
सदा प्यार की फसलें बोना।।

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