बंद होता पुस्तक बाजार: कारण और निवारण-डाॅ. हंसा षुक्ला

पहले हमारे खाली समय में मनोरंजन का सबसे सरल व सुलभ साधन पुस्तकंे होती थी। साहित्य के विभिन्न विधा की पुस्तकें अलग-अलग पाठक वर्ग पढ़ते थे। पढ़ने की उत्सुकता इस चरम सीमा पर रहती थी कि पाठक आगामी अंको की अपनी प्रति निष्चित बुकस्टाॅल में आरक्षित करा लेते थे। बच्चों के लिये बाल साहित्य की विभिन्न पुस्तकें एवं काॅमिक्स, महिलाओं के लिये सरिता, मुक्ता, गृहषोभा, गृहलक्ष्मीं आदि पुस्तकें एवं युवा वर्ग के लिये सामाजिक एवं थ्रिलर उपन्यास उपलब्ध होते थे। वृद्धजनों के लिये धार्मिक पुस्तकें एवं ग्रंथ सरलता से दुकानों में मिल जाते थे। उस समय इलेक्ट्राॅनिक मीडिया या कह सकते हैं इंटरनेट (गुगल, याहु, विकीपिडीया) की उपलब्धता न होने के कारण बच्चे, युवा, महिलाऐं, सभी पुस्तकों की ओर आकर्शित होते थे। स्कूल, काॅलेज में कोई प्रोजेक्ट बनाना हो तो विद्यार्थी ग्रंथालय से पुस्तक लेकर उस प्रोजेक्ट कार्य को पूरा करते थे। षिक्षकों को कोई पेपर बनाना हो, तो वह ग्रंथालय से विशय की पुस्तकें तथा अन्य पुस्तकों में उपलब्ध विशयसामाग्री का अध्ययन कर अपना पेपर तैयार करते थे। इंटरनेट की सुविधा और विभिन्न साइटों पर पुस्तकों की उपलब्धता ने बुकस्टाल की रौनक (ग्राहक) ही कम कर दी। आज पाठक पुस्तकंे डाउनलोड कर अपने मोबाइल या टेबलेट पर आसानी से पढ़ लेते है, साथ ही अपने मित्रों को भी षेयर कर देते है। पहले जब हम पुस्तकें खरीद कर पढ़ते थे तो पसन्द की एवं महत्वपूर्ण पैराग्राफ को या लाइनों को अंडरलाइन कर लेते थे तथा जब हमारी यह पुस्तक कोई मित्र या संबंधी लेते तो वह उस सामाग्री को बड़े ध्यान से पढ़ते थे। कभी-कभी तो उस विषेश पैराग्राफ या लाइनों को पढ़ने के लिये ही पुस्तकें खरीदी जाती थी, एक ग्राहक कोई पुस्तक खरीदता और अच्छी विशय सामग्री होने पर उसके परिचित उस पुस्तक विषेश की प्रति तुरन्त बुकस्टाॅल से खरीदते थे। सरिता मासिक पत्रिका के प्रत्येक अंक में एक संदेष दिया होता था कि क्या आप पुस्तकें मांग कर पढ़ते है? कृप्या पुस्तकें खरीदकर पढ़ें, यह छोटा सा संदेष पाठकों को पुस्तक खरीदने के लिये प्रेरित करता था।
पुस्तकें विद्यालय, महाविद्यालय सार्वजनिक ग्रंथालय तथा घर की न केवल षोभा बढ़ाते थे, बल्कि उसे रूचि पूर्वक पढ़ा भी जाता था। आज पुस्तकों की मांग कम होने का एक और कारण मनोरंजन के अन्य साधनों का उपलब्ध होना है, जैसेः- युवा खाली समय में पढ़ने के बजाय कैफे, माॅल या जिम में अपना समय व्यतीत करते है, अधिकांष महिलायें कार्य क्षेत्र में व्यस्त होतीं हैं तथा गृहिणियां क्लब या किटी को ज्यादा तवज्जो देतीं है इसलिये यह वर्ग भी पुस्तकों से दूर होता जा रहा है। बच्चों के हाथ से पुस्तकों की जगह मोबाईल ने ले ली है तथा टीवी के विभिन्न चैनलों में बच्चों के लिये विभिन्न कार्टून सीरियल एवं रियलटी षो के उपलब्ध है। सभी वर्ग के पाठक कम होने के कारण पुस्तक दुकानों में ग्राहकों की संख्या कम हो गई है, तथा कुछ विषुद्ध पुस्तक दुकानें तो बंद हो गई हैं और कुछ बंद होने के कगार पर है।
इंसान के खाली समय का सबसे अच्छा मित्र मानी जानी वाली पुस्तकें, इंटरनेट के जमाने में दम तोड़ते नजर आ रही है। पुस्तक बाजार को बंद होने से पहले बचाने के लिये सुधिजनों को छाटे-छाटे प्रयास करने होंगे। जैसेः- (1) स्कूल या काॅलेज में अतिथियों का स्वागत पुस्तक देकर करें तथा पुरूस्कार में विद्यार्थियों को पुस्तकें दे।
(2) घर में ग्रहप्रवेष या मंगलअवसर पर प्रतिउपहार (रिटर्न गिफ्ट) में पुस्तके दे तथा घर के ग्रहप्रवेष बच्चे के जन्मदिन में हम पुस्तक उपहार में दे सकते है।
(3) अस्पताल में किसी मरीज से मिलने जायें तो कोई अच्छी साहित्यिक या अभिप्रेरक पुस्तक उसे भेंट करे।
(4) अकेले सफर करने वाले दोस्त या रिष्तेदार को उसके रूचि अनुसार पुस्तक दे सकते है।
(5) विद्यालय/महाविद्यालय में पुस्तक मेंला का आयोजन किया जाये जिससे षिक्षक एवं विद्यार्थियों के मन में पुस्तकों के प्रति रूचि जागृत हो और वो पुस्तक पढ़ने के लिये प्रेरित हो।
(6) विद्यालय में ही विद्यार्थियों के लिये एक कालखण्ड ग्रंथालय का हो, तथा ग्रंथालय में पढ़ी हुई पुस्तकों पर कक्षा में चर्चा की जाये, जिससे दूसरे विद्यार्थी उस पुस्तक के विशय में जाने और पढ़ने के लिये प्ररित हो।
इस तरह छोटे-छोटे प्रयासों से हम पुस्तक के बंद होते बाजार को पुनः गुलजार कर सकते है।
डाॅ. हंसा षुक्ला
प्राचार्य
स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय
आमदी नगर हुडको, भिलाई
9685789815

5 thoughts on “बंद होता पुस्तक बाजार: कारण और निवारण-डाॅ. हंसा षुक्ला”

  1. Shravan kumar soni कहते हैं:

    साहित्य से जोड़ने सराहनीय पहल के लिए आपको शुभकामनाएं

  2. सुषमा दुबे कहते हैं:

    पुस्तकों का चलन बंद होना सच में चिंता का विषय है नया मौलिक लेखन बंद होने से केवल स्तरहीन कापी पेस्ट ही लेखन के रूप में रह जायेगा जो आजकल शुरू हो गया है

  3. संजय मिश्रा कहते हैं:

    साहित्य के क्षेत्र मे बिचार होना चाहिए शुभकामनाये है

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