बंद होता पुस्तक बाजार -: कीर्ति प्रदीप वर्मा

एक समय था जब ज्ञानार्जन और मनोरंजन दोनों का ही साधन पुस्तकें हुआ करती थीं। परंतु आज पुस्तकें और उनके बाजार में जबरजस्त गिरावट आई है इसके कई कारण हैं।आज संचार क्रांति के कारण मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट का अत्यधिक प्रयोग होने लगा है।-किसी भी प्रकार की जानकारी चाहिए, मात्र एक बटन दबाते ही सभी जानकारी मिल जाती है। इंटरनेट के प्रयोग से समय की बचत होती हैं ,जो जानकारी हमें कई पुस्तकों में खोजना पड़तीहै वह इंटरनेट पर मिनटों में मिल जाती है। पुस्तकों के रख-रखाव में अपेक्षाकृत अधिक समय व शक्ति लगती है जैसे दीमक, चूहे आदि से बचाव करना पड़ता inहै। पुस्तकों को रखने के लिए एक निश्चित और सुरक्षित स्थान की आवश्यकता होती है ,जबकि मोबाइल इंटरनेट का प्रयोग कहीं भी आसजानी से 🐕किया जा सकता है । आज नई पीढ़ी में हिंदी पुस्तकों का चलन लगभग बंद हो गया है, जबकि अंग्रेजी पुस्तकों का चलन बढ़ा है । युवा पीढ़ी अधिकतर अंग्रेजी उपन्यास आदि पढ़ना पसंद करती है ।आज मूल पुस्तको के स्थान पर उनकी नकल भी बाजारों में सस्ते दामों पर उपलब्ध हो जाती है। धीरे-धीरे पुस्तकों के बंद होते बाजार एक चिंता का विषय है ,यह बहुत अनमोल धरोहर है जिससे हम नकार नहीं सकते ।हमे पुस्तकों के प्रति प्रेम को जागृत करना होगा। हमें युवा पीढ़ी को महान साहित्यकारों की कृतियों को पढ़ने के लिए उत्साहित करना चाहिए ।जिन्हें पुस्तकें पढ़ने का शौक हो उन्हें उपहार स्वरूप पुस्तकें ही भेंट दी जाना चाहिए।अच्छी कृतियों को खरीद कर पढ़ें और सहेजें जो कि आने वाली पीढ़ी के लिए अनमोल विरासत होगी।चरित्र निर्माण में पुस्तकों का अत्यधिक योगदान होता है और पुस्तकों से बढ़कर कोई मित्र नहीं अतः पुस्तकों को खरीदना और पढ़ना सभी साक्षरों के लिए आवश्यक है अतः पुस्तकें खरीदने और पढ़ने की आदत को जागृत करें और अपने बच्चों के लिए अनमोल विरासत छोड़कर जाए।कीर्ति प्रदीप वर्मा

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