बंद होता पुस्‍तक बाजार, कारण और निवारण:-रमा प्रवीर वर्मा

रमा प्रवीण वर्मा

पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से लेखकों की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है उसी तेजी से पुस्तक बाजार भी सिमटता हुआ दिखाई दिया है | इसका मुख्य कारण इंटरनेट | आज इंटरनेट के माध्यम से लोग खुद ही अपनी ई बुक्स प्रकाशित करने लगे है, क्यूंकि ये कम खर्चीला और कम समय में अंजाम तक पहुँच जाता है | इस तकनीकी युग में कम्प्यूटर पर लेखक खुद ही अपनी किताब को पीडीएफ फ़ाइल में तैयार कर लेते हैं और खुद ही इ बुक्स के रूप में उसे प्रकाशित भी कर देते हैं | और लोग भी किताब खरीद कर पढ़ने की बजाय ई  बुक्स पढ़ना ही ज्यादा पसंद करने लगे हैं जो कि बिना पैसे खर्च किये आसानी से उपलब्ध हो जाती है | दूसरा कारण है पाठकों से ज्यादा लेखकों का होना | लोग पढ़ना किसी को नहीं चाहते पर पढ़वाना सबको चाहते हैं |  देखा जाए तो सोशल मीडिया में आज लेखकों की बाढ़ से आ गई है , क्योंकि यहाँ सबको एक खुला मंच मिलता है जहाँ सब अपनी इच्छानुसार लिखते और प्रसारित करते हैं | दूसरी बात, सोशल मीडिया पर बने मंचों पर भी एक प्रकाशक द्वारा कुछ रचनाकारों को मिलाकर एक संकलन तैयार कर उसका लोकार्पण कर दिया जाता है जिसके एवज में रचनाकारों से पैसे भी लिए जाए हैं | इसका मतलब ये हुआ कि सामग्री प्रकाशन योग्य है या नहीं लेकिन प्रकाशित हो जाती है | इसका सीधा सीधा असर साहित्य के स्तर पर पड़ता हैं | कुछ गिने चुने पाठक हैं भी तो उन्हें अच्छे स्तर का साहित्य नहीं मिलता पढ़ने के लिए |
इस समस्या से निपटने के लिए आवश्यक है कि साहित्य के स्तर को सुधारा जाए | जो साहित्य वास्तव में पढ़ने योग्य हो उसे ही किताब के रूप में प्रकाशित किया जाये न कि साहित्य का व्यवसायीकरण किया जाये | और हर लेखक का एक पाठक होना भी अति आवश्यक है , क्योंकि अगर वो अच्छा साहित्य पढ़ेगा तभी अच्छा साहित्य गढ़ेगा |

रमा प्रवीर वर्मा
नागपुर, महाराष्ट्र

1 thought on “बंद होता पुस्‍तक बाजार, कारण और निवारण:-रमा प्रवीर वर्मा”

  1. अशोक ए गेहलोत, बैंगलोर कहते हैं:

    आदरणीय रमा वर्मा जी का बंद होता पुस्तक बाज़ार पर सटीक विश्लेषण हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि वाट्सएप और फेसबुक पर नए नए छपास रोगी अपने आप को साहित्यिक बताने पर तुले हुए हैं। किसी की भी रचना को अपने नाम से बताने में भी नहीं चूकते है। दूसरा लोगों को इतना समय नहीं है कि सही साहित्य को ढूँढ कर पढ़ा जाए। तुरंत और एक साथ एक साथ सैकड़ों लोगों को अंगुली के माध्यम से वाट्सएप पर छपकर आत्म सन्तुष्टि पाने वाले असली और अच्छे साहित्य के दुश्मन हैं। लेकिन डिजिटल जमाने में कुछ नहीं किया जा सकता। हमें आने वाली पीढ़ी को इस गिरे हुए घटिया साहित्य से बचाना है तो पुस्तक प्रकाशन और उससे जुडाव बनाना होगा। बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा।

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