बंद होता पुस्‍तक बाजार, कारण और निवारण:-विवेक रंजन श्रीवास्तव
 आज  त्वरित मनोरंजन एवं   आर्थिक लाभ की दौड़ में लगे लोगों को शायद ज्ञान की नहीं केवल तात्कालिक जानकारी की जरूरत ही अधिक होती है , जो उन्हें Google से इंटरनेट पर उपलब्ध हो जाती  है ,  मनोरंजन के समानांतर साधन हर हाथ में उपलब्ध है।  साहित्यिक पुस्तकों की मुद्रण संख्या में निरन्तर गिरावट हो रही है । पहले संस्करण में अच्छी किताबें भी महज 100 या 200 की संख्या में मुद्रित की जा रही हैं । और वे भी विजिटिंग कॉर्ड की तरह बांटने पर कवि व लेखक विवश हैं । यद्यपि वैज्ञानिक संसाधनों से  पुस्तक प्रकाशन सरल हुआ है पर पाठकीयता का अभाव है । पुस्तक प्रकाशन रचनाकार की आत्मतुष्टि मात्र बनता जा रहा है ।
 पुस्तकें सच्ची मित्र होती हैं , पुस्तकें ज्ञान का भंडार होती हैं । किंतु गहरे मनन का समय ही लोगो के पास नही रह गया है । यद्यपि युवा पीढ़ी किंडल व ईबुक्स पढ़ रहा है पर पुस्तक बाजार केवल शैक्षिक किताबों तक सीमित होता जा रहा है ।
पुस्तको के मूल्य निर्धारण के कोई नीतिगत तर्कपूर्ण नियम नही है । शासकीय खरीदी में प्रभाव शाली लोगो की पुस्तकें असाधारण मूल्य पर क्रय की जा रही हैं । यह चिंताजनक स्थिति है ।
इस स्थिति से निवारण का उपाय यही है की जनमानस में पुस्तकों की लोकप्रियता बढ़ाने हेतु हरसंभव प्रयत्न किए जाएं। उपहार में जन्मदिन , गृह प्रवेश , स्वागत विवाह इत्यादि अवसरों पर किताबें भेंट करने की परंपरा विकसित की जाए।  लोकप्रिय विषयों पर उपयोगी पुस्तकों का लेखन बढ़ाया जाए।  कालजयी शाश्वत साहित्य की रचना को पुरस्कृत किया जाए।  पुस्तकालयों के विकास को बढ़ाया जावे तभी हम पुस्तक बाजार को सक्रिय बना सकेंगे यह जिम्मेदारी  आज की रचनाकार पीढ़ी की ही है जिससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते। 
विवेक रंजन श्रीवास्तव 
मोबाइल 700037 5798

1 thought on “बंद होता पुस्‍तक बाजार, कारण और निवारण:-विवेक रंजन श्रीवास्तव”

  1. रीता जयहिंद अरोड़ा कहते हैं:

    नाइस लेखन

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