बंद होता पुस्तक बाज़ार, कारण और निवारण-: डॉ राजकुमारी वर्मा
यह सर्वविदित है कि आज इंटरनेट के युग में लोगों में पुस्तकों का अध्ययन करने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। किसी को जब भी किसी विषय मे जानने की आवश्यकता होती है तो वे तुरन्त कंप्यूटर खोलते हैं और गूगल या यू ट्यूब उनकी समस्त समस्याओं को पलक झपकते सुलझा देता है। जब रेडीमेड सामग्री तुरन्त उपलब्ध है तो कोई पुस्तकों में सिर क्यों खपाये। यह मैं नहीं कह रही हूँ बल्कि लोगों की मानसिकता के विषय मे बता रही हूँ। तो इससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि आज प्रायः पुस्तकों को पढ़ने की इच्छा का अभाव दिखाई देता है। पुस्तको का अध्ययन करना बोरिंग और उबाऊ माना जाता है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पुस्तक बाजार पर पड़ा है। पहले की अपेक्षा आज पुस्तकों की दुकानें बहुत कम दिखाई देती हैं और उनमें भी प्रायः सन्नाटा ही पसरा रहता है। यदि यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब पुस्तक बाजार का अस्तित्व ही समाप्त हो जाये।
इसलिए इस समस्या पर हमें गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। पहले लोगों की पुस्तकों में इतनी श्रद्धा होती थी कि वे उन्हें साक्षात् माँ सरस्वती मानते थे और पढ़ने से पूर्व उन्हें मस्तक से लगा कर मन ही मन उनकी पूजा करते थे। किन्तु अब यह देखने को नहीं मिलता।
पुस्तकों के प्रति पुनः श्रद्धा भावना उत्पन्न हो इसके लिए हमें बहुत प्रयास करने की आवश्यकता है।  पुस्तको के प्रति रुचि न होने की वजह से बच्चों को किसी भी विषय का उतना गहन ज्ञान नहीं हो पाता जितना होना चाहिए। गूगल से वे तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति तो कर लेते हैं किंतु जो संस्कार, परम्पराएं और नैतिक मूल्य पुस्तकों से प्राप्त होते थे, वे उन्हें प्राप्त नहीं हो पाते। पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण करके वे खुद को बहुत आधुनिक महसूस करते हैं।
आज अपनी संस्कृति की ओर लौटने के लिए हमें वैदिक साहित्य के साथ ही वर्तमान साहित्य की भी आवश्यकता है जो हमें पुस्तकों से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए हमें भरसक प्रयत्न करके पुस्तकों के अस्तित्व को बचाना चाहिए। माता-पिता और गुरुजनों का कर्तव्य है कि वे बालकों को अच्छी पुस्तकें पढ़ने के लिए अभिप्रेरित करें। अच्छी पुस्तकों को खरीदने की आदत डालें और उन्हें संगृहीत करें। घर मे एक छोटा सा पुस्तकालय बनायें और ज्ञान, विज्ञान, गणित, कला, संगीत, साहित्य आदि की पुस्तकें घर में रखें। स्वयं अध्ययन करें और घर में आने वाले लोगों को भी अध्ययन के लिए प्रेरित करें।
जिस प्रकार लोग अपने घर में एक ड्राइंग रूम बनाते हैं उसी प्रकार से घर में एक सुंदर सा छोटा सा पुस्तकालय भी बनाएं। हर घर मे पुस्तकालय बनाने की परम्परा से लोगों का पुस्तकों की ओर रुझान बढ़ेगा। फिर निःसन्देह पुस्तकों के भी अच्छे दिन आएंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।
डॉ राजकुमारी वर्मा

1 thought on “बंद होता पुस्तक बाज़ार, कारण और निवारण-: डॉ राजकुमारी वर्मा”

  1. रीता जयहिंद अरोड़ा कहते हैं:

    वैरी नाइस

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