कर्मनाशा नदी -रमेश भभुआ

मेरे गाँव के बगल से गूजरी,
कर्मनाशा नदी—-
जब मुझे ख्याल आया,
एक नदी है समझ पाया ।

मैं पहली बार,
अपने गाँव के स्कूल से,
पाँच पास करके,
पार करने लगा,
नदी को बार-बार।

देखा ऊँची-ऊँची नदी का अरार।
था दोनों तरफ आर-पार।
कल-कल की ध्वनि करती हुई,
लहर आगे की तरफ बढती हुई।

नाव जब–
लहर के थपेड़ो को सहती हुई,
लोगों के भार से पानी में धसती हुई।
अग्रसर अपने ठांव —–
लहरो को दो भागो में बाटती हुई।

नाविक जब–
नाव को किनारो से दूर ले जाता।
नाविक से मिलने के लिए दूसरा किनारा।
बेसब्री से इन्तजार करता ।
यही बार-बार मिलन बिछुड़न हुआ करता ।

इस पार से उस पार ,
लोग आवश्यकतानुसार,
आया -जाया करते थे।
नदी के सूखे भाग पर ,
रेत के ढेर पर ,
कंकड़ के बीच में,
चमकते हुए सफेद-
घोघी और सूतुही।
बिखरे हुए मोती के समान,
आभा लिए दिखाई देता।

जब मैं पुछा —
उस बुढे बैठे नाविक से,
नदी निकली है किधर से ,
गई है किधर को,
शायद उस नाविक का मौन रहना ।
मेरे लिए उत्तर मिलना।
उसे भी पता नहीं था ओर छोर।

मगर उस नाविक का क्या होता ?
हर लोगों को अपनी तरफ क्यों खिचता है ?
रात के आखिरी समय में,
पानी की पटरियों पर,
नाविक की गाड़ी चढती है।
अपनी गहरी नींद में ही,
मनुष्य हिलने लगता है।

मछलियाँ अपनी भाषा में,
क्या कहती हैं नाव को ?
रेत पर रेंगते हुए,
केकड़े कछुए क्या सोचते हैं ?
किनारों पर।

मैं जानता हूँ —
गाँव वालों के लिए,
कितनी पुरानी नदी है।
जो दक्षिण से निकलीं हुई,
हर आदमी के बचपन के,
बहुत पहले से बह रही है।
गाँव के पास में।

@रमेश कुमार सिंह /२०-०९-२०१५

2 thoughts on “कर्मनाशा नदी -रमेश भभुआ”

  1. रीता जयहिंद अरोड़ा कहते हैं:

    अति सुंदर

  2. रीता जयहिंद अरोड़ा कहते हैं:

    नाईस

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