कुम्भ स्नान बाद-मधु गौतम।

शिप्रा तट पर मैं,
भाव शून्य खड़ा था।
मैंने देखा कुम्भ बाद,
कुछ पाप , घाट पर डल रहे थे।
तो कुछ, सलिल संग चल रहे थे।
कुछ पाप गल चुके थे पूरे
तो कुछ अभी गल रहे थे।
मैंने एक पाप देखा।
हाथ में लेना चाहा।
पर हाथ से फिसल गया।
यह मासूम का पाप था।
जो जल्द ही गल गया।
और भी ऐसे पाप थे।
जो हो गए निष्पाप थे।
थोडा सा आगे बढ़ा,
तो एक और हत्थे चढ़ा।
यह बाप का पाप था।
पाप क्या महा अभिशाप था।
मैंने उसे छूना चाहा
पर हाथ नही आया।
मैंने पूछ लिया आप,
कब तक पड़े रहोगे।
क्या कभी गलौगे।
वो बोला हाँ धीरे धीरे,
गल जाऊँगा।
सन्तान हित के लिये हुआ हूँ,
तो मुक्ति भी ज़रूर पाउँगा।
आगे एक पडौसी का पाप था।
स्वार्थ में लिपटा अनाप सनाप था।
न बहा जा रहा था।
न टिक पा रहा था।
मैंने उसे तोला ,
कुछ बोला,
उसने अपना मुंह खोला।
अपने स्वार्थ से जुल्म ढाया है।
देवतुल्य पडौसी को सताया है।
अब बस लुढ़क लुढ़क कर,
गोल हो रहा हूँ।
शने शनै गलूँगा ।
पहले टोल हो रहा हूँ।
आगे चला।
बड़ा इडियट पाप मिला।
बहुत बोला पर ।
उसने मुंह नही खोला।
यह अफसर का पाप था।
यह पाप का भी बाप था।
बरसो यही सड़ेगा।
फिर दूसरे कुम्भ में
जाकर यह गलेगा।
अचानक एक पाप कौंधा।
जो पीछे छूट गया था।
पाप था भी या नही।
पता नही टूट गया था।
बोला में मां का पाप हूँ।
बहुत बड़ा अभिशाप हूँ।
मैंने पूछा आखिर किया क्या है।
वो बोला सन्तान को ,
कुमार्ग पर चलाया,
खुद कुमार्ग पर चली।
इसलिये ही में पाप की मां हूँ
जो अभी तक नही गली।
मैं बोला माँ ,मैं पचा नही पा रहा हूँ।
माँ कुमार्गी ,मैं लिख नही पा रहा हूँ।
आप क्या है ,आप जानो,
या जाने विधना ,मैं कौन हूँ।
आपके बारे में ,
मैं सौ फीसदी मौन हूँ।
आगे बड़ा तो,
एक पाप देखा ।
जिस पर नकली छाप है।
मुझे लगा यह x जाति का पाप है।
और एक पाप को तैरते पाया।
फिर भी जो आगे ।
नही बढ़ रहा था।
तो यह y जाति का ।
पाप मुझे लग रहा था।
सब ही पाप कुछ छोटे,
तो कुछ बड़े लग रहे थे।
उन सब पर किसी न किसी,
PQRजाति के,
नाम छप रहे थे।
घाट पर एक तरफ
पापकी एक गठरी सी थी।
जो परतो में लिपटी थी।
यह पति द्वारा किया गया,
पापो का पूरा डला था।
जिसने अनेक धोखो से।
पतिव्रता को छला था।
अब यह इतना भारी था।
न बह पा रहा था।
न गल पा रहा था।
उसके पीछे ही
राम घाट के नीचे ही ,
एक नारी का कृत्य था।
पाहन सा भारी ,वो सत्य था।
पति को भाव नही देती थी।
परपुरुषो में रत रहती थी।
कैसे गला पाउंगी, इस पाप को।
शिप्रा भी यही कहती थी।
अब आगे एकदम तल में।
जो काई सा,चिपका पड़ा था।
ऊपर से साफ़ अंदर से मैला,
यह दोस्त का पाप बड़ा था।
यह न गलेगा, और न ही बहेगा।
सदा दुसरो को भी छलेगा।
खुद भी यही रहेगा।
आगे छोटे बड़े किनारे ।
तरह तरह के पाप से लदे थे।
कोई सन्त तो कोई गृहस्थ
तो कोई कुंआरों के फंदे थे।
अब आइये ,
कुछ और पापो से बतियाते हे।
जो रुक नही रहे ,बस बहे जाते है।
अरे यह क्या यह तो ,
छोटे बड़े नेताओ के पाप हे।
जिनके असमान नाप है।
बातो ही बातो से ,
खूब भरमाया है।
कुछ ने इनसे चैन तो
कुछ ने कष्ट पाया है।
सो यह न डूब पाते है।
न ही घाट पर रुक पाते है।
यह तो बहकर सब,
समन्दर में जाएंगे।
जिनको जीव नोच नोच,
कर खा जायेंगे।
पर यह गलेंगे नही।
यह उन जीवो के,
पेट में जाएंगे।
और उन्हें भी सतायेंगे।
और भी ना जाने।
कितने पाप हे।
जिनसे शिप्रा ही क्या।
कोई नदी नही साफ़ है,
मैं सभी के पापो से ,
मिलकर आया हूँ।
फिर भी कुछ समझ नही पाया हूँ।
राम जाने ‘मधु’ पाप मुक्त हुआ।
या कोई नया पाप कर आया हूँ।
पर यह सौ फीसदी सच है कि
बिना डूबे कुम्भ में नहाया हूँ।
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मधु गौतम
कोटा राजस्थान

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