रंगमंच से दूर होते हुआ-सुधीर सिंह।

सुधीर सिंह

आज कल देखा यह जा रहा है।युवा हर कुछ ,सब कुछ पल में पा जाना चाहता है। वह शीघ्रता से हर कार्य कर रहा है। परिणाम की चिंता किये बगैर वह बस दौड़ लगा रहा है। कुछ दिन पहले मैं एक साहित्यिक कवि गोष्ठी में सम्मिलत होने गाज़ियाबाद से  दिल्ली गया जहाँ कुछ युवा हॉल में बैठे थे वे कार्यक्रम में बैठे कार्यक्रम प्रारम्भ होने का इंतजार कर रहे थे।कुछ युवा अपनी रचना को याद कर रहे थे,कुछ उसे किस तरह पढ़ रहे थे जैसे रचना पाठ का रिहर्सल कर रहे हों। एक दूसरे में मग्न थे। उनमें एक नए नमस्ते किया क्या जानकर बुजुर्ग जानकर या कुछ और पता नहीं एक नए कहा सर आप अशोक जी हैं मेरे ना कहने पर वह युवा चुप हो गया। कवि गोष्ठी काव्य पाठ के लिए एक रंगमंच देता है। रिहर्सल का भी मंच है जहाँ  आपको कुछ के सामने अपनी कला(काव्य पाठ) को पेश करना होता है।  खैर कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। “हिंदी गौरव” संस्था का नियम है वह युवा रचनाकारों को मंच प्रदान करता है। 5 से 7 युवाओं को पहले मंच रदान किया गया। कुछ ने लाजवाब रचनाएँ सुनाईं।पर यह देख कर निराशा हुई वे अपना रचना सुनाने के बाद बैग उठा कर चलते बने। आयोजक को यह बात बहुत नागवार गुजरी उन्होंने जाते हुए युवाओं को कहा,”आपने तुकबंदी करके रचना सुनाई,यह काव्यक श्रेणी में नहीं आता है। ऐसा होने लगेगा तो देश के 80 % लोग कवि कहलाने लगेंगे, इस गोष्ठी में यहाँ बुजुर्ग और वरिष्ठ रचनाकारों को आप सुनना-गुणन नहीं  चाहते हो आप अपने को शायद विज्ञ मान बैठे हो तो यह आपकी गलतफहमी है। इतनी जल्दी इस मंच से वह सब कुछ नहीं आपको मिल सकता जब तक आप विद्यार्थी नहीं बनना चाहोगे।” कुछ तो रुके लेकिन आधे चले गए रुके नहीं। रंगमंच क्या जीवन के सभी जगह युवाओं में यह कमी देखने में आ रही है। पता नही काहे की होड़ मची है। यह सब देखकर दुख भी होता है।

सुधीर सिंह राष्ट्रीय संयोजक, मंज़िल ग्रुप साहित्यिक मंच (मगसम)
ए-2,फ्लैट नंबर-1503,15 रहवाँ तल,सेवियर पार्क,मोहन नगर,गाज़ियाबाद-07,उत्तर -प्रदेश मो0-9953479583

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