रंगमंच से दूर होते युवा-ज्‍योति मिश्रा

ज्‍योति मिश्रा

रंगमंच वह पहला स्थान है, जहाँ कलाकार सही अर्थों में अपने अभिनय का प्रदर्शन कर सकता है। किंतु आजकल रंगमंच से “रंग” ही गायब हो चुका है,आज का युवा वर्ग सिर्फ एक ठोस धरातल पर जीना पसन्द करता, जहाँ से उसे अच्छी खासी आय भी हो और उसकी कला को तुष्टि भी प्राप्त हो जाये। आज लगभग सभी युवा अपने कैरियर को लेकर ज्यादा सजग हैं। अगर इक्का- दुक्का इस तरफ बढ़ना भी चाहते हैं, तो माता-पिता की रोक उनको इससे दूर कर देती है। तो बाक़ी कलाएँ तो अपने स्थान पर परिपूर्णता को प्राप्त हो जाती हैं किंतु रंगमंच बस रंगकर्मियों की प्रतीक्षा में सूना पड़ा रहता है।
मुम्बई के रंगमंच जो प्रसिद्ध हैं वहाँ भी अब भाषा प्रभाव छोड़ रही है, माह में 20 दिन मराठी के लिए और बचे दिन अंग्रेजी के लिए निश्चित हैं माह में बमुश्किल 2 या 3 शो ही हिंदी के हो पाते हैं और उन्हें अच्छा प्रतिसाद नहीं मिल पाता। आवश्यक नहीं कि जिस कलाकार ने किसी बहुत अच्छे अभिनय शाला से या किसी बहुत बड़े अभिनेता से ही अभिनय की शिक्षा ली हो, कला तो जन्मजात होती है जो मँजने के लिए कहीं भी जा सकती है। आज युवाओं का रंगमंच से दूर होने का एक कारण यह भी है कि उसके पास उतना समय या पैसा नहीं होता। आज के युवा का भविष्य सिर्फ रंगमंच से नहीं सँवर सकता यह सोच भी उसे रंगमंच से दूर कर देती है।

नोट- 3 विजेताआें की घोषणा 14 दिसम्‍बर,विजेताओं का फैसला50प्रतिशत लाइक व कमेन्‍ट पर। आगामी विषय- बंद होता पुस्‍तक बाजार, कारण और निवारण । अक्षर सीमा 700 अंतिम तिथि 13 दिसम्‍बर 2017, प्रकाशन तिथि 15-16 दिसम्‍बर।

 

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