श्रीमती वर्णाली बनर्जी: रंगमंच से दूर होते युवा

वर्णाली वनर्जी के विचार

रंगमंच समाज का दर्पण हैं, जिसे कलाकार अभिनय कर प्रस्तुत करते हैं। रंगमंच के जरिए प्रदर्शन का मूल मकसद है कि समाज जागरूक हो और बुराइयां जड़ से साफ हों। जिस बात को कहने के लिए लोग हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं, उन विचारों को, अंदर की छटपटाहट को, अपनी कला के जरिए मंच पर प्रदर्शित करते हैं। रंगकर्मी जब रंगमंच पर, समाज के लिए अभिशाप बन चुके दहेज प्रथा, जलिया वाला बाग कांड या नमक का सत्याग्रह आंदोलन या बाल विवाह या अन्य ज्वलंत मुद्दों पर प्रस्तुति देते हैं तो यह सीधे दर्शक के मनोभावों पर असर डालती है। युवाओं के जोशीले अंदाज का फायदा समाज को हमेशा ही आंदोलन, युद्धभूमि, देश को विकसित करने की राह पर मिला है।भारत में आजादी के वक्त भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, नेताजी, भगत सिंह जैसे अनेक युवाओं के कारण ही भारत को आजादी मिल पाई। पर असल दुनिया में युवा वर्ग रंगमंच की दुनिया से दूर हाेते जा रहे हैं। खासतौर पर कल-पुर्जों और कम्प्यूटर की नगरी में l माता-पिता उन्हें इंजीनियर, डाक्टर या पाइलट बनाना चाहते हैं, इधर रंगमंच उन्हें अपनी ओर खींचता है, दर्शकों की तालियां गड़गड़ाहट हमेशा उनके कानों में गूंजती है। पढ़ाई के साथ थिएटर को भी जारी रखा जा सकता है, पर उन्हें माँ बाप की मर्ज़ी माननी पड़ती है l वे करियर और नौकरी को ही प्राथमिकता देते हैं l
बहुत से युवा रंगमंच से जुड़ना चाहते हैं लेकिन उन्हें प्लेटफार्म नहीं मिलता। और कभी हार के डर से, इच्छाओं के पूरे न होने के डर से, दबाए जाने के डर से उनकी मनोस्थिति रंग मंच दे दूर चली गयी है l इस तरह से नगर के रंगमंच वर्षो से खामोश हैं। नाटक को लेकर खास कर युवा वर्ग में रुचि नहीं देखी जाती है। वे मंच से दूर होते जा रहे हैं। हिन्दी नाटको को वही प्रस्तुत किया जा सकता है जहाँ हिंदी बड़ी संख्या में बोली जाती है, इसलिए नाटको का अनुवाद विभिन्न भाषाओ में होनी चाहिए l लेखको को भी हास्य के साथ-साथ एक राजनीतिक कटाक्ष पर लिखनी चाहिए l नई पीढ़ी जिस तरह के नाटक चाहती हैं वैसे हिन्दी नाटक कम लिखे जा रहे हैंl एक सफल नाटक की वास्तविकता है, कम खर्च में ‘’आम’’जनता से जुडना, उनकी समस्याओं से सरोकार जैसे अभाव, मंहगाई, बढती हुई जनसंख्या, प्रशासनिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार, प्रदूषण आदि जन जीवन से जुडी समस्याओं से रु-ब-रु कराना! अनूदित नाटकों को अपेक्षानुकूल दर्शक नहीं मिल रहे हैं! रंगमंच में ज़िंदगी को दिखाना, सारे सन्वादो को कंठस्थ कर कहानी प्रस्तुत करना, सम्पूर्ण सम्वेद्नओं और सच्चाइयों, अनुभूतियों के साथ उसे दर्शकों के समक्ष पेश करना। इसमें बहुत ज़्यादे रेहेर्सल,परिश्रम है : फ़िल्मो और दूरदर्शन की तरह रिटेक और डब्बीन्ग, पुनरावृत्तियों की भी सम्भावना नहीं है तथा काॅस्ट्यूम, मंच डिजाइन, प्रसाधन, मंच-सामग्री, हॉल, साउन्ड के लिए काफ़ी पैसो की ज़रूरत होती हैl गाँवों के गरीब बाशिंदों के लिए दो जून की रोटी जुटाना एक समस्या होती है, कला और अन्य आभिजात्य शौक तो दूर की कौड़ी होते हैl सरकारी स्तर पर भी नाटक व कलाकार के विकास का प्रयास नहीं किया जाता है।
इन दिनों युवाओं का ध्यान करियर पर रहता है। इसलिए कला के प्रति उनका झुकाव कम ही रहता है। सरकार की ओर से कलाकारों को सुविधा प्रदान नहीं की जाती है। इसके प्रचार-प्रसार पर ध्यान नहीं दिया जाता है। आज के दौर में नाटक के क्षेत्र में करियर की असीम संभावनाएं हैं।
इसके लिए सरकार को आगे आना चाहिए, आज के दौर में रिहर्सल व टूर की व्यवस्था होनी चाहिए। तभी कलाकार अपनी प्रतिभा को निखार सकेंगे। कलाकारों के लिए अच्छी पगार और नियोजन की भी व्यवस्था होनी चाहिए। युवा वर्ग तभी इससे जुड़े रहेंगे। नाटक समाज का आईना होता है। इसे जिंदा रखने का प्रयास करना चाहिएl नाटक व नाट्यकर्मी को बढ़ावा देने के लिए लोगों को भी आगे आना चाहिए। लोगों को फ़िल्मो की चकाचौंध, देश-विदेश के दृश्य बहुत भाते हैं, पर सिर्फ सिनेमा नहीं, टिकट खरीद कर नाटक भी देखना चाहिएl आवश्यकता है इस समस्या को एक अभियान का रूप देने की।

नोट- 3 विजेताआें की घोषणा 14 दिसम्‍बर,विजेताओं का फैसला50प्रतिशत लाइक व कमेन्‍ट पर। आगामी विषय- बंद होता पुस्‍तक बाजार, कारण और निवारण । अक्षर सीमा 700 अंतिम तिथि 13 दिसम्‍बर 2017, प्रकाशन तिथि 15-16 दिसम्‍बर।

21 thoughts on “श्रीमती वर्णाली बनर्जी: रंगमंच से दूर होते युवा”

  1. Shweta कहते हैं:

    Very nice though shared by Mrs.barnali..

  2. रमेशचन्द्र डागर कहते हैं:

    निःसंदेह नाटक का अपना एक अलग मुकाम है जिसे जिन्दा रखने के लिए युवा वर्ग को आगे बढ़ चढ़कर भाग लेने की जरूरत है।श्रीमती बरणाली बनर्जी द्वारा लिखित उपरोक्त लेख रंगमंच से दूर आज के युवा वर्ग के लिए एक प्रेरणा भरा मंत्र है जिसका जाप करने की नितान्त जरूरत है।

  3. विकास सिंह कहते हैं:

    बहुत ही अच्छा लेख है, लेखक के विचार अत्यंत प्रशंसनीय है ।

  4. Syed Irfanulla कहते हैं:

    Bilkul main Barnali saheba se mutafiq hoon, aap kisi bhi zaban ko us ke culture ko us waqt tak nahi bacha ya nikhaar sakye jab tak aap us ke rang manch ke kalakaroon ke liye ek dam thoos qadam na uthayein.
    Sirf huqumat hi nahi NGO’s ko bhi is simat mein aage aana chahiye aur Kalakaroon ko un ka sahi haq dilane mein apna role bhar pur ada karna chahiye.

    Barnali jaisi saqsiyatoon ko salaam jinhone asal mein sahitya ko apna pura pura hissa ada aur jivan diya.

  5. Tahseen Zafer कहते हैं:

    Very well written article..Barnali ji…You have rightly written that today’s youth can’t make theatre as Thier carrier..it doesn’t pay them…good writeup!!!

  6. Preeti कहते हैं:

    Very true. Today’s youth is getting misled by the false glamour and artificiality presented by the film’s. The background music, the costly settings shadow the real talent and the fame is too short spaned.

  7. Meena कहते हैं:

    Very well written. How to see more from you

  8. Arif Patel कहते हैं:

    सभी कलाकारों के लिए शुभकामनाएं

  9. Preeti कहते हैं:

    Well said. Passion and profession can run parallely what requires is proper time management and support from near and dear to ones.

  10. Surya Mani Dash कहते हैं:

    Beautiful thoughts.Should materialise.Time come how to encourage young generation to give fruitful thoughts to our society.

  11. अमित बंसल कहते हैं:

    सही कहा लेखिका जी ने इसके लिए एक अभियान की आवश्यक्ता है

  12. रेनू शर्मा कहते हैं:

    नवयुवकों को जागृत करने के लिए बर्नलि जी ने जो शब्द लिखे ह । मेंउससे सहमतहूँ।

  13. Brigadier Mushtaq कहते हैं:

    A very apt article in todays context .Very well articulated by Barnaliji.

  14. Samarendra कहते हैं:

    Good one! Very well written and quite relevant!

  15. Chandrani Choudhury कहते हैं:

    I totally agree. Amazing article.

  16. Shreyas HN कहते हैं:

    Amazing article. Lot to learn for the youngsters.

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