‘मेरे गांव की चिनमुनकी’ विषयवस्तु की अभिव्यक्ति -डॉ. चित्रांशी

धीरज श्रीवास्‍तव

पुस्‍तक समीक्षा- साहित्य की गद्य तथा पद्य विधा में युवा गीतकार धीरज श्रीवास्तव ने पद्य विधा को आत्मसात् करते हुए अपनी मौलिक भावोद्भावना शक्ति की अलौकिक प्रतिभा-प्रकर्ष से चालीस गीतों का एक संग्रह ‘मेरे गांव की चिनमुनकी’ के माध्यम से तुकबन्दी और छन्दमुक्त कविताओं के दौर में भी नादमय स्वरूप वाले छन्दोब( गीतों की वापसी पर छन्द को कविता संसार में पुनः जीवित करने का सफल प्रयास किया है। गीत संग्रह ‘मेरे गांव की चिनमुनकी’ में निहित गीतों के भाव और उनकी भाषा में अपनी मिट्टी की सोंधी महक से ओत-प्रोत पर्व, त्यौहार, रिश्ते, जीवन मूल्य, संस्कृति का परिलेख बहुत ही सुन्दरता से परिलक्षित है। गीत-संकलन का प्रत्येक गीत सजीव है तथा मानव-हृदय-स्पंदन की भांति ही इसमें लोक चेतना ,संस्कृति का स्पंदन दिखाई देता है। इसी स्पंदन में निहित सुर, लय, ताल और आरोह-अवरोह, धीरज श्रीवास्तव के गीतों को गेयता प्रदान करते हैं। धीरज श्रीवास्तव के गीतों में विषयवस्तु की अभिव्यक्ति इतनी अधिक बोधगम्य है कि उनके गीतों में नीरसता, एकरसता, ऊब और भारीपन दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते बल्कि उमंग, सरसता, समरसता के साथ-साथ उत्साही परिवेश का निर्माण करते हुए दिखाई देते हैं। उनके गीतों ने अपने हृदय के अंतस में माटी की महक के साथ-साथ लोक व समाज की गमक और सामाजिक प्रवाह का कलरव भी समाहित कर रखा है।
गीत संकलन का शीर्षक ‘मेरे गांव की चिनमुनकी’ शृंगार रस से लबरेज एक ऐसी रचना है जिसमें मधुर अलाप, अवलोकन, स्पर्श, आलिंगन, कटाक्ष और रोमांच का सुंदर सम्मिश्रण है तथा मात्र नियम से बंधा छन्द, इसको लयात्मकता प्रदान करते हुए मानस पटल पर अपना मोहन करती हैं :
मीठे गीत प्रणय के गाकर
और रात सपनों में आकर
मुझको रोज छला करती है
मेरे गाँव की चिनमुनकी
गीत के मुखड़े की पंक्तियों में ही कवि के भोलेपन ने मन की चंचलता, सपने और लाचारी की ऐसी त्रिवेणी बहा दी कि इस शृंगारित गीत का कथ्य और शिल्प पाठक को अपनी ओर आकर्षित कर, उनके हृदय का स्पंदन बन, उन्हें अपना बनाने में सफल रहा। गीत का यही उत्कृष्ट रूप ही इस गीत-संकलन को साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान दिलाने में मदद करेगी।
विज्ञान और तकनीकि के युग में जब लोक संस्कृति एवं चेतना पर करारा प्रहार कर उसे नष्ट करने की कोशिश की जा रही हो, ऐेसे समय पर ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े कवि धीरज श्रीवास्तव के संकलन में संकलित लगभग सभी गीत लोक चेतना व संस्कृति विषय से जुड़कर पाठकों के समक्ष एक चुनौती के रूप में उभरकर आते हैं :
पहन चूड़ियाँ लीं तुमने या
मुंँह पर कालिख पोत लिया
जबरन तुमने खेत तुम्हारा
पूरब वाला जोत लिया
आते तुम इस कलुआ को हम
मिलकर सबक सिखाते भाई
लौट शहर से आते भाई
कुछ तो फर्ज निभाते भाई
लौट शहर से आते भाई, कुर्ते में अब नील, चाहे जितनी कर लो भाई, कमली चली गई आदि गीत में मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की याद ताजा कर देती है, जिसमें उन्होंने उस काल के एक-एक पल को जिया है। ठीक उसी तरह से भाई धीरज ने भी समाज की वेदनाओं को, अपने गीतों के दिल की धड़कन बनाकर, उन्हें एक ऐसी शब्द वाणी दे दी, जो समाज से सीधे संवाद करते हुए दिखाई देती है :
मुखिया जी सब जान रहे थे
किसने अस्मत लूटी थी
और बिचारी क्योंकर आखिर
अन्दर से वह टूटी थी
देशी दारू थी पहले ही
मछली तली गई
देख गाँव का भ्रष्ट आचरण
कमली चली गई
समाज में फँसी विकृतियों के प्रति पाठकों को चैतन्य करने का काम भली-भाँति निष्पक्षता से करती हुई दिखाई देती हैं। एकलव्य साधना के पक्षधर धीरज श्रीवास्तव प्रतिकूल परिस्थितियों में भी निज गीत संस्कृति को बचाने के लिए चेतना की इनकी काव्य साधना को देखकर मेरा मन कह उठा :
जब-जब धीरज ने किया, नूतन शब्द मिलाप
चिनमुनकी तब-जब हुई, काव्य जगत की छाप
‘मेरे गाँव की चिनमुनकी’ को साहित्य जगत में एक उत्कृष्ट काव्य ग्रंथ के रूप में स्थापित करने के लिए युवा कवि को साधुवाद। आपकी लेखनी नए-नए गीतों का सृजन करती रहे, इसी अभिलाषा के साथ पुनः काव्य पुस्तिका ‘मेरे गाँव की चिनमुनकी’ के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ।

डॉ. प्रदीप कुमार चित्रांशी वरिश्ठ साहित्यकार अध्यक्ष साहित्यांजलि प्रज्योति इलाहाबाद-211003

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