”सांसों के सन्तूर” विद्रुपताओं पर प्रहार और पीड़ा को दुलार करता अनुपम दोहा सँग्रह : धन्‍श्‍याम मैथिल अमृत

समीक्षक धन्‍श्‍याम मैथिल अमृत

गीति काव्य में निःसन्देह दोहा शताब्दियों से सृजकों,पाठकों के मध्य एक लोकप्रिय छंद के रूप में उपस्थित रहा है । एक छोटे से दोहे के माध्यम से बड़ी से बड़ी ,गम्भीर और सारगर्भित बात प्रभावी ढंग से व्यक्त की जा सकती है,इसीलिए आदिकाल से तुलसी,बिहारी,रहीम और कबीर से लेकर वर्तमान समय तक दोहे की लोकप्रियता,स्वीकार्यता असंदिग्ध रही है। बड़ी से बड़ी कविता के माध्यम से जो बात नहीं की जा सकती, वह एक दोहे के माध्यम से व्यक्त की जा सकती है ,दोहा स्वरूप में भले छोटा हो,परन्तु प्रभाव में बड़ा मारक और गम्भीर होता है । आयु की दृष्टि से वरिष्ठतम साहित्यकार आचार्य भगवत दुबे की सृजन यात्रा अनथके ,अनवरत आज भी सृजन के नए शिखर ,नए सोपानों का स्पर्श कर रही है ,उसी का सुपरिणाम है साहित्य की विविध काव्य विधाओं में यथेष्ठ सृजन ,अनेक पुस्तकों के प्रकाशन, के साथ ही पांच दोहा संग्रहों के पश्चात 1000 दोहों का नवीन सँग्रह “सांसों में सन्तूर ‘ पाठकों के सम्मुख है । सँग्रह के इन दोहों में आचार्य जी की दृष्टि व्यापकता के दर्शन हमें जहां-तहां होते हैं,उनके विराट अनुभव का संसार, दार्शनिक जीवन,उच्च चिन्तन ,अध्ययन,का वैशिष्ठ्य देख -पढ़ श्रोता मंत्र मुग्ध हो जाता है । वरिष्ठ साहित्यकार डॉ बलदेव बंशी सँग्रह की भूमिका में लिखते हैं ‘वरिष्ठ हिंदी कवि की लेखनी ने वर्तमान के यथर्थ को तो बांध ही है इस लघु छंद में ,साथ ही दिशा देने का हितैषी अनिवार्य पक्ष भी ओझल नहीं रहने दिया । ‘ इसी के साथ दोहा विधा के लिए समर्पित वरिष्ठ दोहाकार श्री हरेराम ‘समीप इस सँग्रह के बारे में अपना मन्तव्य प्रकट करते हुए’ लिखते हैं ” साँसों के सन्तूर” दोहा सँग्रह कई मायनों में आचार्य भगवत दुबे जी की काव्य-यात्रा का एक विशिष्ट और उत्कृष्ट आयाम है । इस सँग्रह में वे अपना प्रौढ़ अनुभव संसार लेकर हाजिर हुए हैं जहां वर्तमान सृष्टि और दृष्टि को वे अपनी सम्वेदना और अनुभूति से गूंथ कर एक हजारी दोहा माला के रूप में प्रस्तुत कर रहे है इन दोहों के माध्यम से उन्होंने जीवन और जगत से जुड़े विविध विषयों,,स्थितियों, और सन्दर्भों को अभिव्यक्ति प्रदान की है ।”इस सँग्रह में आत्म निवेदन “नमन” के अंतर्गत आचार्य जी ने अपने ह्र्दयोदगार भी पाठकों के सम्मुख रखे हैं उनका एक अंश भी आपके सम्मुख रखना समीचीन समझता हूं | वे लिखते हैं ‘दोहा अपभ्रंश काल का अत्यंत लोकप्रिय छंद रहा है,ग्राम्यांचलों की पगडंडियों,चौपालों, खेत-खलिहानों और वनस्थलिक जनपदों से लेकर राजपथों तक का सूक्ति सहचर यह दोहा छंद,लोकरंजन का महत्वपूर्ण साधन तो रहा ही है,पथ-प्रदर्शक के रूप में भी यह छंद सूक्ति सन्धान करता रहा है ,दोहा छंद अपने उद्भव काल से ही साहित्य में सदैव लोक चेतना का संवाहक रहा है ।’दोहे को परिभाषित करता उनका एक दोहा अपनी पूरी बात कुछ यों स्पष्ट करता है — मध्यकाल का शूरमा,दोहा काव्यकिरीट , धुरंधरों की गोटियां ,पल में देता पीट ,। आईए सँग्रह के एक से बढ़कर एक दोहों में से कुछ दोहों पर दृष्टि डालें । आचार्य जी प्रकृति को ही परमेश्वर का रूप मानते हैं ,तब ही तो वे लिखते हैं ‘जल जंगल पानी पवन सूर्य चन्द्र आकाश,इन सबमें भगवान का होता है अहसास ,। आज वर्तमान समय में बाबाओं, तथाकथित चमत्कारी गुरुओं ने गुरु शब्द की महत्ता को काफी क्षति पहुंचायी है, गुरु पद की महिमा और महत्व को रेखांकित करता एक दोहा ” रहता जिनके पास में,दिव्य ज्ञान भरपूर,वे सद्गुरु रहते सदा चमत्कार से दूर,। आज समाज में हर जगह बेईमानी और भ्र्ष्टाचार के चर्चे हैं ,लोग झूँठ को महिमामंडित करते दिखाई देते हैं ,ऐंसे लोगों का आव्हान करते हुए दोहाकार सत्य का समर्थन करते हुए लिखता है “विजय सत्य की हो सदा,हारे झूँठ असत्य, हमें सुयश सुख शांति का,पथ दिखलाता सत्य, वर्तमान समय में बुजुर्ग मां -बाप वृद्धाश्रम क्यों जाने को विवश हैं ,माता-पिता की सेवा हमारे संस्कार में होना चाहिए ,क्यों दोहा देखें ” आन-बान मां -बाप की ,करना मत उन्नीस,पाओ यश सुख सम्पदा, ले जाओ आशीष , पेट ,रोटी और

रचनाकार–आचार्य भगवत दुबे

भूख के इर्द-गिर्द कैसे एक गरीब का जीवन घूमता है ,इस दर्द की अभिव्यक्ति को दोहे से यों व्यक्त किया है “सबके भूखे पेट का,है रोटी ही धर्म,मील किसी भी जाति से,भूख न माने शर्म , अपनी भूमि,अपनी संस्कृति पर आज पाश्चात्य के बढ़ते प्रभाव से चिंतित ही कर दुबे जी लिखते हैं ‘अपनी सँस्कृति का नहीं,सहन करो अपमान,मिट जाएगी अन्यथा ऋषियों की पहचान, निर्धनता,अभाव ,गरीबी का एक चित्र देखिए “नून तेल आटा कभी,कभी न पायी डाल, दो रोटी देता नहीं क्रूर वक्त कंगाल, आज के भौतिकतावादी बदलाव से चिन्तित हो वे लिखते है “रद्दी में बेचे गये,गीता वेद पुराण,घर में रखा खरीद कर,एक विदेशी श्वान, वर्तमान विसंगतियों के विरुद्ध जूझते हुए आदमी की नियति का एक चित्र ‘जीवन भर करते रहे ,विपदा का विषपान,नीलकंठ जैसा मगर,मिला नहीं सम्मान,। इस सँग्रह का शीर्षक जिस दोहे से लिया गया है उसमें उस परम की आराधना करते हुए आचार्य जी लिखते हैं “साईं दीपक राग है,पातकतम हो दूर, बजट उनके नाम से साँसों के सन्तूर ,।  विभिन्न प्रकार की समस्याएं हमारे राष्ट्र और समाज में हैं ,हम उनके विरुद्ध संघर्ष करें ,निश्चित एक दिन यह अंधियारा परास्त होगा ,प्राची से नव सूर्य की नव रश्मियों विखरेंगी इसी आशा को लेकर कवि दोहा लिखता है ” अस्त,कभी होता नहीं,आशा का दिनमान,पंछी करते हैं सुबह फिर से मंगलगान,। आचार्य जी के इस दोहा सँग्रह में प्रकृति,पर्यावरण,तीज-त्यौहार, ऋतुएं ,गांव, महानगर, किसान ,मजदूर, भूख ,बेरोजगारी, अश्पृश्यता, भ्रष्ट राजनीति, बेलगाम नोकरशाही, जीवन के हर विषय को दोहों का विषय बनाया है। कहीं-कहीं दोहों में भाव की दृष्टि से विरोधाभाष भी देखने को मिलता है जैसे गांव को लेकर दो दोहे देखें “गांवों में अमरावती आकर करे विहार,देख प्रकृति सौंदर्य को,होता हर्ष अपार,। एक अन्य दोहा देखिए ” बदले-बदले लग रहे ,आज हमारे गांव,कटे जंगलों को कहीं मिले न शीतल छाँव ,। आचार्य जी के इन दोहों की भाषा आम आदमी की भाषा है ,इसमें जहां उन्होंने परिष्कृत ,शुद्ध खड़ी हिंदी का प्रयोग किया है वहीं ,दूसरी और उर्दू भाषा के सहज बोल-चाल के शब्दों जैसे मुराद,तासीर,औजार,ताबीज,बेपीर,पैगाम,तहजीब,दस्तावेज,मजमून,आमीन जैसे शब्दों का बखूबी प्रयोग किया है,इसके साथ ही जो अंग्रेजी भाषा के शब्द दोहों में आवश्यकता के अनुसार आ गए हैं तो उन्हें भी उन्होंने दुत्कारा नहीं सम्मान पूर्वक अपने दोहों में स्थान दिया है |कुछ शब्द देखिए रॉकेट,सेल्यूट,जाकेट,टेलीफोन,सेक्टर,बर्थ-डे, ,रिमोट,कम्प्यूटर,रिसर्च,मोबाइल,लैंड,कॉलोनी,ई-मेल इत्यादि,। एक श्रेष्ठ दोहा सँग्रह के लिए आचार्य जी को कोटि कोटि बधाई |
पुस्तक–साँसों के सन्तूर (दोहा सँग्रह)
रचनाकार–आचार्य भगवत दुबे
पृष्ठ–136 मूल्य-250/-
प्रकाशक–पाथेय प्रकाशन ,जबलपुर
समीक्षा –घनश्याम मैथिल “अमृत”
जी/एल-434 अयोध्या नगर,भोपाल -462041
मो0 9589251250

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