मौत के साये में लेखनी, दोषी कौन?

भारत एक ऐसा देश है जहाँ सब स्‍वतन्‍त्र है। संविधान की धारा 19 के ए बी सी से हर आदमी को बोलने की स्‍वतन्‍त्रता एवं विचारो की अभिव्‍यक्ति की आजादी है। जिसके तहत भारत में चलने वाले समाचार पत्र, न्‍यूज चैनल, पत्र पत्रिकाए प्रकाशित होती है। इनके लिए कोई अलग से प्रविधान नहीं है। समाज के चार स्‍तंभ में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मिडिया। आख्रिर ये चौथा स्‍तंभ माने जाने वाले मिडिया का काम आखिर है क्‍या? क्‍यों मिडिया को चौथ्‍ाा स्‍तंभ कहा जाता है ? आखिर कौन सा उद्वेश्‍य था, मिडिया को चौथा स्‍तंभ का दर्जा देना का?
मैं समझता हूँ कि मि‍डिया को चौथा स्‍तंभ का दर्जा देने का स्‍पष्‍ट कारण था कि विधियिका, कार्य पालिका, न्‍याय- पालिका और जनता के बीच आपसी संबंध स्‍थापित करना, जनता की आवाज जो इन तक नहीं पहँच पा रही है उसे इन तक पहुॅचना, समाज की तस्‍वीरे दिखाना क्‍योंकि जनता के पास शासन तक अपनी बात पहुँचाने का आज की तरह पहले संसाधन नहीं थे मीडिया का काम होता था , अपने अध्‍ािकार के लिए लोगो को जाग्रत करना, उनमें हौसला पैदा करना, और अन्‍याय के खिलाफ लड़ना , इस लिए शायद मिडिया को चौथा स्‍तंभ का दर्जा प्राप्‍त हुआ, मगर क्‍या मिडिया अपना काम कर रही है? शायद 95 प्रतिशत लोगो का जबाब आयेगा मिडिया आपना काम बिल्‍कुल नहीं कर रही है, वह समाज को सच नहीं दिखा रही है, वह आडम्‍बर कर रही है, वह लोगो को जगा नहीं रही है, वह रूपये पर अपना ईमान बेच रही है, बिकाऊ एवं दलाल हो गयी, दोगली एवं भाड़ हो गयी है आज की मीडिया, ग्‍लैमर की दिवानी हो गई है आज की मीडिया। शायद यह सही भी है।
मगर बातें कभी एक तरफा नहीं होती , हर सिक्‍के के दो पहलू होते है, मगर आज की मिडिया का बस एक पहलू है वह है काला दाग, मगर क्‍यों नहीं अपने दायित्‍व का निर्वाह कर पा रही है आज की मिडिया क्‍या कारण है? जनता के बीच अपनी प्रतिष्‍ठा खोते जा रही है मिडिया?
मगर मैं अपनी बात कहने से पहले एक बात का जबाब चाहूँगा कि अगर मीडिया का काम जनता को जगाना, और सरकार को समाज की हकीकत दिखा कर समस्‍या को दूर करना है तो आज भारत से सारी समस्‍यायें खत्‍म हो जानी चाहिए क्‍योकि आज जो काम भारत सवा तीन लाख छोटे बडे मीडिया संस्‍थान नहीं कर सकते वह भारत की करोड़ो जनता कर रही है । सोशलमीडिया के माध्यम से समस्‍या को रोज दिखा रही है हिन्‍दुओं की बात दिखा रही है ।गो वध दिखा रही है । दंगो की हकीकत से रूवर करा रही है। हर वह समस्‍या और बात कर रही है जिसके लिए 3 तीन लाख मिडिया प्रतिष्‍ठान लगें है , तो समस्‍या दूर हो चाहे न हो क्‍या जाग गई भारत की जनता, क्‍या वह आ गई समस्‍या को दूर करने के लिए मुख्‍य धारा में । मुझे तो लगता है नहीं, आप को जो लगें। रही बात दलाली और इल्‍जाम की तो साफ बात है अपनी अपनी डफली अपना अपना राग। आज के समाज में हर कोई मिडिया को अपने हाथ की कठपुतली बना चाहता है, उसे अपनी चाभी से चलाना चाहता है, वो भूल जाता है कि हर मिडिया कर्मी आप के बीच का ही है, व

आज का समाज सच पढ़ना तो चाहता है सच देखना तो चाहता है मगर सच बोलना नहीं चाहता सच लिखना नहीं चाहता, सड्क पर हत्‍या हो जाये, दुकानदार पैसा अधिक ले, कोई अन्‍य बात हो, रोड न बने, वह चाहता हैं कि बस मिडिया लिखें उसे कुछ न करना पडे् वह घरो में सोया रहें। वह अपने घरो से निकलना नहीं चाहता, वह अपनी समस्‍यओं के लिए दो कदम चलना नहीं चाहता, वह आगे आना नहीं चाहता।
बस क्‍या कर रही है मिडिया, मिडिया की दोगली नीत कह कर अपने कर्तव्‍य की इति श्री कर लेता है।

एक मिडिया कर्मी अपने समाचारो में लिखता है कि इस समस्‍या के दूर न होने से जनता परेशान है आन्‍दोलन पर बाध्‍य है मगर जब हकीकत की धरातल पर आकर सरकार के नामुन्‍दे देखते है तो पता चलता है कि अखबारों को छोड़ आन्‍दोलन की बात एक बच्‍चा भ्‍ाी नहीं कर रहा है जनसमूह की बात तो बहुत दूर है। ऐसे वह अखबार और वह पत्रकार अपनी अहमित खो देता है।

मैने देखा है कि अगर कोई व्‍यक्ति किसी समाचार के लिए किसी पत्रकार के पास जाता है तो वह इल्‍जाम तो लगाता है मगर अपना नाम देने को बहुत ही कम लोग तैयार होते हैं । जब सवाल जबाब होता है तो निकल पड़ते है, किसी कार्यक्रम में फोटो कराने के लिए आगे आ जाते है । सबकी चाहत होती है कि मुख्‍य में मीडिया उसे बनाये मगर कार्य करने बात में सब नदारद। आज का मिडिया किसी के‍ विरोध में सच्‍ची बात लिखे तो साफ इल्‍जाम लगा दिया जाता है कि उसने विज्ञापन माँगा मैने नहीं दिखा इस लिए ऐसु खबर छप गई, वह खबर बेबुनियाद है, और वह अपने दो चार पॉंच लोगो के साथ उस समाचार का खंडन करवा देता है ,जनता उसके सर्मथन में आ जाती है,।
एक मिडिया कर्मी किसी नेता द्वारा किये गये गलत कार्यो को दर्शाता है उनके द्वारा क्षेत्र के विकास न किये जाने की बात कहता है अगले दिन उसी नेता का काफिला जब गॉंव/शहर में आता है तो उसका काफिला और बढ़ जाता है। अपनी समस्‍याअेा की बात जनता न कह कर उसके द्वारा किये गये कार्यो को बडाई करने लगते है उसके साथ तस्‍वीर खीचवाने को व्‍याकुल रहते है। इससे नेता को क्‍या प्रतिक होता होगा आप स्‍वंय आकलन करें। मैं कोई आकड़ो की बाजीगरी या प्रर्दशन नहीं कर रहा हूँ सिर्फ वह बात कह रहा हूँ जो आज की हकीकत के धरातल पर देखा है मैने।
आज आप मीडिया पर दलाली और दोगले पन के साथ साथ बिकाऊ होने का आरोप लगा तो मैं सहमत हूँ आपकी बात से मगर एक बात बतायेगें ठीक है मीडिया बिक गई पर क्‍यों बिकी? जिस दिन से मीडिया मास कम्युनिकेशन हो गयी उस दिन से मीडिया, मीडिया न रख कर व्‍यापार हो गई। जिसका कारण मुझे समझाने या बताने की जरूरत नहीं कि आज इन कोर्स को करके जाने वाला आदमी केवल ग्रामीण पत्रकार की तरह विज्ञापन के कमीशन या 300 रूपये महीने पर काम नहीं करेगा, और जो मीडिया संस्‍थान ऐसे मास कम्युनिकेशन कोर्स के लोगो को जगह नहीं दे रही है उनकी जगह पाठक या दर्शक में नहीं है, वह आउट आफ मारर्केट हो जाती है।
ग्रामीण पत्रकार तो आज भी दिन भर मेहनत करता है और अगर उसके पास अलग से अपना व्‍यवसाय न हो तो वह शाम को भूखे पेट सोयेगा, अपने बढे़ दुश्‍मनो की संख्‍या के साथ, असुक्षित। आज तो मरने पर भ्‍ाी मीडिया मालिक अपने पत्रकार क साथ नाता तोड़ देते है, वह अपने पत्रकार को एक आम आदमी बना कर उसकी लिखते है, विगत 2011 में भदौरा के एक पत्रकार स्‍व दिलीप सिंह को अमर उजाला अखबार ने खबर छापा–वाहन सवार की सड़क दुर्घटना में मौत–जब कि क्षेत्र जानता था कि वह अमर उजाला के पत्रकार है।
आज राजेश मिश्रा के हत्या के बाद उनके संघ से जुड़े होने के कारण कुछ राजनेता और जनप्रतिनिधियों ने संवेदनाऐ जरूरत व्यक्त की, घटना स्थल पर गये, परिवार का हाल लिये, मगर अधिकाशं तो चुप ही रहे। जनता तो गूँगी बहरी बनी रही, कोई संस्था नहीं बोली, जबकि पत्रकार हमेशा इनका साथ निभाते है।
स्व० मिश्र भी यदि संघ के कार्याकर्ता न होते तो शायद सत्ताधारी कोई नेता भी नहीं जाता। पुलिस तो इतने पर भी अपने मन से चली और धटना स्थल से कुछ दूर रहने पर भी दो धंटे बाद मौके पर पहुँची।
आखिर पत्रकार पत्रकारिता करे तो कैसे, शासन, प्रशासन, न्यायपालिका, जनता साथ देती नहीं। मीडिया कम्पनी उसे अपना कर्मचारी नहीं मानती। कुछ भी तो नहीं है उसके साथ उसके पास।
आज समाज और मीडिया दोनो का व्‍यवसाईकरण हो चुका है , हमारे आज का हर पत्रकार आपके ही बच का है , आपके ही समाज का है वह भी आप के रंग में रगा हुआ है, वह भी इंसान है मगर हम उससे आशा देवताओं की तरह करते है।
मैं यह नहीं कहता कि जो कुछ मीडिया में हो रहा है पूर्ण रूप से सही है मगर उसके लिए केवल मिडियाकर्मी को जिम्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता, आज की पूरी कार्य प्रणाली इसके लिए जिम्‍मेदार है ।
अखंड गहमरी।

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