वीरो की धरती गहमर

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जनपद में स्थित गंगा के पावन तट मॉं कामाख्या के अॅाचल में बसा गहमर बीरता, साहित्य एवं आपसी सौहार्दय का एक बेमिसाल उदाहरण है। सन् 1527 में राजपूताें एवं बाबर के बीच हुए खानवॅा के युद्व में राजपूतों की हार हुई। इस युद्व में फतेहपुर-सिकरी के राजा धाम देव अपना सब कुछ गवाॅं देने के कारण हताश हो गये थे, तेा उनकी कुलदेवी मॉं काॅंमाख्या ने उन्‍हें स्वप्न में आदेशित किया कि वह काशी की तरफ प्रस्थान करे और विश्वामित्र एंव जमदिग्न को तपोभूमि में निवास करो। उनके आदेश से राजा धाम देव काशी की तरफ प्रस्थान कर दिये। उस समय यहॅा चेरू-राजा शशांक का आधिपत्य था। राजा धाम देव एवं उनके साथ आये परिवार, पुरोहित एवं उनके हितैसियो ने उनके साथ युद्व कर उन्हें पराजित कर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया और वही सकराडीह के पास मॅंा काॅंमाख्या मंदिर की स्थापना कर निवास करने लगे । कालचक्र के साथ धीरे-धीरे लोग आस-पास के जगहाे पर अपना डेरा जमा लिये। इस गॉं का विस्तार होता चला गया। वर्तमान समय में इसका विस्तार 9.5 वर्ग किलोमीटर तक फैला गया। उस समय गंगा का बहाव मॉं कामाख्या धाम के पास ही था, परन्तु समय के साथ गंगा की धारा उस स्थान से दूर होने लगी।
प्राचीन काल में गहमर का नाम गृहामर एवं गहवन होने का भी उल्लेख होता है। गाजीपुर गजेटियर में भी गृहामर का ही जिक्र है परन्तु लोगो का मानना है कि अंग्रेजो के भारत आगमन के बाद भाषा विकार के तहत गृहामर का नाम गहमर हो गया वही कुछ लोग इसका पुराना नाम गहनवन बताते है परन्तु इतिहास से यह बात प्रमाणित नहीं होती है कहा जाता है 1530 के पहले ही यह क्षेत्र काफी विकसित हो चुका था जिससे तथा चेरू राजा का साम्राज्य था इस लिये जंगल होने का प्रश्न ही नही होता है। अतः ये माना जाता है कि गहमर का पुराना नाम गृहामर था जो राजा घामदेव के नाम नामका शाब्दिक अर्थ है। मॉं कामाख्या के आर्शीवाद से यहॉं आने और अपना राज स्थापित होने के कारण यहॅा बसे लोग अपनी संतानो का मुॅंडन मॉं के स्थान पर कराने लगे। गंगा पूजन और गंगा नदी के बीच नाव पर सवार होकर गंगा की बीच धारा में गंगा की परिक्रमा करने का दृष्य काफी रोमांचकारी होता है।गंगा पूजन के बाद सभी लोग धाम पर आते है, मुॅंडंन का कार्यक्रम हेाता है। और संस्कार में शामिल सभी लोगो को प्रसाद वितरण के पश्चात भोजन कराया जाता है।
गहमर खास, गंगवरार गहमर, निजामपुर, पाममझउवा, सकरहट, पथरा, सिकन्दरपुर, कपूरपुर, मलिकपुरलाजी, जीवनरायनपुर, सुल्तानपुर, पटखौलिया, धानापुर, चैराही, आनन्दपुर, उचितपुर, अकबरपुर, हरनाथपुर, मनिहर कला, मनिहर खुर्द, केशवपुर, इटवा, पचैरी, हथौरी, सायर, राजमलबाध, टडवा, रायसेनपुर, चकविदामन, रामपुर कनवा, मलिकपुर, हरिशंकरपुर समेत कुल 32 मौजो एंव राजाधाम देव के पुत्रों, पौत्रों एवं प्रपौत्रो के नाम पडे़ मधुकरराव, गोविन्दराव, भैरोराव, खेमनराव, चैधरीराव जिसका पूरा नाम परवलराव चैधरी, टीकाराव, दवनराव, घोपालराव, भीउराव, बाबूराव, परमाराव, हजूरीराव, गंगाविसून राव, कुबेर राव, खेलूराव, मैगर राव, भीषम राव सहित कुल 22 पटृीयांे के इस गॅंाव में मुख्य रूप से सिकरवार वंश के राजपूत निवास करते है उसके साथ यहॉं ब्राहम्ण, कायस्त, चमार, कोईरी, मल्लाहए धोेबी अनेक हिन्दु जाति के साथ साथ मुसलमानो की सिकरवार पठान, धुनियां, कुजड़ा, इराकी, अन्सारी, डफाली जातियॉं निवास करती है। यहॅा वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में मतदाताओ की संख्या 24734 थी। अब इस गॉंव की आबादी लगभग एक लाख के आस पास हैं। यहॅंा की बढ़ती आबादी और बड़े क्षेत्रफल के कारण वर्ष 1978 में गहमर को तत्कालिन पूर्व मुख्यमंत्री स्र्वगीय वीर बहादुर सिंह ने टाऊन एरिया घोषित कर दिया था परन्तु शासन एंव ग्राम सभा के बीच टकराव के कारण मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुॅंच गया जहॅा शासन की हार हुई और गहमर पुनः सन् 1994 मेें ग्राम सभा घोषित कर दिया गया और सन् 1995 में चन्द्रावती देवी गहमर की प्रधान बनी। गहमर केा टाऊन से दुबारा ग्राम सभा कराने में यहॅॉं के लोगो ने काफी लड़ाई लड़ी शासन द्वारा अपनी मॉंग पूरी न होने पर यहॅा के लोगो ने 1896 में रेल रोको आंदोलन भी किया जिसमें हताश सरकार ने गोली चलाने का आदेश दे दिया जिसमें दर्जनो लोग घायल हुए बाद में यह मामला न्यायालय में पहुॅचा जहॉं शासन की हार एवं गहमर वासीयो की बिजय हुई। यहॅा के लेाग अधिंकाश सेना में है। मुख्य पेशा खेती एवं पशुपालन हैं ।

स्वतन्त्रता संग्राम में विश्व युद्व में गहमर
एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा गॅाव होने का गौरव गहमर गॉंव को प्राप्त है साथ ही यहॉं के सैनिकों एवं साहित्यकारो के कारण इसका इतिहास गौरवशाली रहा है। सन् 1857 से लेकर कारगिल युद्व तक गहमर के रणबाकुरांे ने अपनी वीरता का लोहा मनवाया है। सन् 1857 के प्रथम स्वतन्त्रंता संग्र्राम में मैंगर सिंह,विजय सिंह,रामाशरण सिंह, अपूर्व सिंह, सहित दर्जर्नो वीरो ने अंग्रेज़ो के दाॅत खटटे किये थे और गहमर में स्थित अंग्रेजो की नील फैक्टरी उड़ दिया तथा उसके मालिक रार्बट स्मिथ केा नदी के रास्ते भागने पर मजबूर कर दिया।गहमर के ही शिवराम सिंह, केदारनाथ सिंह, सुरेन्द्र सिंह, इन्द्रदेव सिंह, डोमा सिंह,दूध नाथ सिंह ने नेता जी सुवाष चन्द्र बोस के आजाद हिन्द फौज में शामिल होकर जंगे आजादी में हिस्सा लिया ।
प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्व में गहमर के 228 सैनिक शामिल हुए जिसमें 21 शहीद हो गये। उनकी याद में गहमर जूनियन हाई स्कूल में बना आज भी स्मारक के रूप में मौजूद है। सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में दूधनाथ कुश्वाहा, मुखराज पांन्डेय एवं दरोगा सिंह ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह किया। स्वतंन्त्रता संग्राम में विश्वनाथ सिंह गहमरी, गौरी शंकर सिंह राजा राम सिंह, केशरी नंदन,बलराम दास साहु, हरि सिंह, रामतिलेश्रवर सिंह, फूलेमान खान, लक्ष्मी कानू, मान्धाता सिंह सहित सैकड़ो वीरो ने अंग्रजी हूकूमत केा हिला कर रख दिया । सन् 1942 में ही गहमर के रामतिलेश्रवर सिंह के नेतृत्व में गहमर में अंग्रेजी शासन के विरोध में गहमर रेलवे स्टेशन एवं डाकघर में तोड़ फोड करते हुए दोनो जगहो केा आग के हवाले कर दिया पूरे क्षेत्र में अंग्रेजी शासन का विरोध होने लगा जिससे अंग्रेज इस कदर घबड़ा गये कि उन्होनें पूरे गहमर गॅंाव केा डायनामयट से उड़ाने की धमकी दे डाली । आजादी के बाद गहमर के पंचायत भवन पर इन वीरो को श्रृंधाजली देने के लिये के लिये एक स्मारक का भी निर्माण कराया गया।
भारतीय सेना में गहमर के रणबाकुराें का आज भी विशेष योगदान है। आजादी के बाद गहमर के नौजवान और जज्बे के साथ भारतीय सेना में भर्ती होने लगे। आजादी के बाद हुए युद्वो में भी गहमर के नौजवानो ने अपनी वीरता का लोहा मनवाया और 1962 में विश्वनाथ सिंह यादव, 1965 में भानू सिंह तथा 1971 की लड़ाई में शैाकत अंसारी शहीद हो गये। गहमर के नौजवानो का उत्साह देखते हुए भारतीय सेना गहमर में विशेष भर्ती कैम्प का आयेाजन करती थी, जिससे अपरिहार्य कारणो से बन्द कर दिया गया। फिर भी  नौजवानेा के जोश में कोई कमी नही आयी और आज गहमर के लगभग हर घर से कम से कम एक युवक जरूर सेना में भर्ती है। भूतपूर्व सैनिको की बढ़ती संख्या एवं उनकी समस्या के समाधान के लिये गहमर में जहॅंा भूतपूर्व सैनिक कार्यालय है, वही उनके लिये हर महीने  कैन्टीन की व्यवस्था की जाती है, जिससे जरूरत के सामान वह खरीदते है। गहमर एक मात्र ऐसा गॉंव है जहॉं मिलिट्ररी कैन्टीन वाहन पर सवार होकर आती है।  लगभग 15 हजार से अधिक पूर्व सैनिक हैं ।
-ः साहित्य:-
गहमर का साहित्य क्षेत्र में योगदान कम नहीं है। गोपाल राम गहमरी ने ऐसे समय में जब अखवार या पत्रिका निकालना काफी कठिन कार्य था, उस ( सन् 1900 ) समय में उन्होनें जासूस नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। इसके साथ ही उन्होनंे जासूसी, आध्यात्मिक, एवं नाटको के लगभग 400 पुस्तकांे की रचना की। जिनमें भानमति, नए बाबू, मालगोदाम की चोरी, जासूस की चोर, भोजपुर का ठग इत्यादि प्रमुख रही है। गोपाल राम गहमरी के नाम पर गहमर हनुमान चैतरा के शहीद पार्क मेें तत्कालिन ग्राम प्रधान स्र्वगीय यदुनाथ सिंह द्वारा 1980 में एक स्मारक का निर्माण कराया गया जिसका लोकार्पण वित मंत्री कमलापति त्रिपाठी द्वारा किया गया था। साथ ही उनके स्मृतियो को सहेजने सवॅंारने के लिये दामोदर सिंह मास्टर, योगिन्द सिंह मास्टर एवं सत्यनारायण नन्दा जी गोपालराम गहमरी पुस्तकालय की स्थापना की गयी है पूरे साल अनेक साहित्यीक समारोह का आयोजन होता है।गहमर के पंडित शीलता प्रसाद उपाध्याय ने पंडित मदन मोहन मालवीयै के साथ सहयोगी संम्पादन का कार्य किया। भोजपुरी रचनाकार भोला नाथ गहमरी, भोजपूरी काब्य रचनाओं एवं लोकगीतो के लिये सदैव याद किया जाता रहेगा। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार एवं भोजपूरी एकेडमी पटना द्वारा काब्य शास्त्री की उपाधि के साथ कई अन्य पुरस्कारो के विजेता रहे है। आनंद संधिदूत डा0 भारतेन्दु द्विवेदी ने भी साहित्य के क्षेत्र में गहमर का नाम रौशन किया। गहमर निवासी डा0 कपिलदेव द्विवेदी को तो भारत सरकार ने संस्कृत साहित्य में विशेष योगदान के लिये पदमश्री सम्मान से सम्मानित किया। गहमर के सत्यनारायण सिंह नन्दा जी को पत्रकारिता एवं लेखन के क्षेत्र में मध्य प्रदेश सरकार द्व़ारा सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान समय में पूरे भारत में अपने हास्य और व्यंग के मंच पर ख्याति अर्जित करने वालो में फजीह़त गहमरी ने क्षेत्र का नाम रोैशन किया है। वही ओज के सशक्त रचनाकार मिथलेश गहमरी ने काफी शोहरत बटोरी है। गहमर के प्रदीप पुष्कल ने हिन्दी कविता जगत केा एक नया आयाम दिया है। उनकी कई रचनाये समाचार पत्रो में प्रकाशित हो चूकि है। लोक गौरव सम्मान से सम्मानित आनन्द गहमरी के लिखे 300 से अधिक भोजपुरी गीत, फिल्मो एवं लोकगीत गायको द्वारा गाये जा रहे हैं।
खेल-इस गॅंाव का प्रमुख खेल फुलबाल है। लेखा रक्षा विभाग में कार्यरत एंव गहमर के सैकड़ो युवको को रोजगार प्रदान करने वाले स्र्व0 ठाकुर योगेश्वर सिंह के नाम पर गहमर के डुबुकिया बाग के मैदान में लगभग तीस वर्षो तक अन्र्तराज्यीय फुटवाल प्रतियोगिता का आयोजन होता रहा। राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली इस प्रतियोगिता में  उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, उत्तराखड़ के साथ स्पोट्र्स कालेज लखनऊ एवं स्पोट्र्स कालेज पटना की टीमें खेल चुकी है। वही पूर्व प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, पूर्व मुख्य मंत्री वीर वहादुर सिंह, अमर सिंह सहित देश की नामचीन हस्तियाॅं भी इस प्रतियोगीता में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हो चुकि है। इस प्रतियोगिता केा चलाने में राम देव बाबा, बाल्मिकी सिंह, विमलेश सिंह, सतेन्द्र सिंह नीटू, लियाकत अन्सारी, शशि सिंह जैसे लोगो का विशेष योगदान रहा है। डुबुकिया बाग में शासन द्वारा स्टेडियम बनाने के नाम पर मैदान को काफी छोटा कर दिया गया इस कारण गहमर क्षेत्र में होने वाली यह प्रमुख प्रतियोगिता बन्द करनी पड़ी जिससे खेल प्रेमियो में काफी निराशा देखने केा मिल रही है। यहॅंा बारह प्राइमरी एवं माध्यमिक विद्यालयों के साथ दो इन्टर कालेज एवं दो महाविद्यालय भी है। दो डाकघर दो युनियन बैंक की शाखा, एक स्टेट बैंेक की शाखा, एक इडियन आयल का पेट्रोल पम्प, साइबर कैफे, नीजि रेलवे आरक्षण केन्द्र, शान्ती पैलसे नामक पिक्चर हाल, एक खेल स्टेडियम, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, दो राइस मिले, एवं खेतो की सिंचाई के लिये गहमर गंगा नदी से निकली गहमर पूर्वी एवं गहमर पश्चिमी पम्प कैनाल एवं जमानिया- बारा मुख्य राजवाहा भी है जिससे गहमर एवं आसपास के क्षेत्रो की लगभग हजारो एकड़ जमीन की सिचाई होती है। आधुनिक एवं भौतिक सुविधाओ के सामानो की बिक्री के लिये पकड़ीतर बाजार है जो गहमर की प्रमुख पहचान है। शारदीय नवरात्रि में गहमर में जहॅंा हिन्द सेवा सदन एवं रामलीला कमेटी रामचबूतरा द्वारा रामरीला का मंचन होता है। वही कुल तीन जगहो पर दुर्गा प्रतिमा का आयोजन होता हैं। यहॉं की एक प्रमुख पहचान सिकरवार राजपूताें की कुल देवी मॉं कामाख्या का पावन स्थल है, जहॉं प्रतिवर्ष चैत्रीय एवं शरदीय नवरात्रि में बिहार, झारखण्ड , एवं सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश से हजारों की संख्या में श्रृद्वालु आते हैं ।कहा जाता है कि युद्व के समय मॉं कामाख्या सैनिकों की रक्षा युद्व भूमि में जाकर करती रही है। हिन्दुओं के इस प्रमुख मंदिर के साथ यहॉं सिद्व बाबा की मठियाॅं, बुलाकी दास की मठिया, बरसाल बाबा, पंचमुखी मंदिर  जहॉं 5 मुखवाले हनुमान जी की र्दुलभ मुर्ति स्थापित है। सायरी-बसौनी माई, शहीद बाबा एवं बक्स बाबा जिनकों यहॉं के हिन्दु और मुसलमान दोनो की पूजते है के साथ गहमर में दो महस्जिद और एक ईदगॅाह भी मौजूद है। यातायात- गहमर हावड़ा- दिल्ली मेन लाइन पर दानापुर रेल मंडल में स्थित उ0प्र0 का एक पहला रेलवे स्टेशन है। रेल प्रशासन द्वारा इस स्टेशन की सदैव ही उपेक्षित की गई हैं। वृहद आबादी एंव सैनिको की भारी तादात के बावजूद यहॉं देश के सीमाओं की तरफ जाने वाली गाड़ीयो का ठहराव नही हैं साथ ही सैनिको को मिलने वाले फ्री यात्रा टिकट वारेन्ट पर आरक्षण कराने की सुविधा भी उपलब्ध नही है।इस रेलवे स्टेशन पर हावड़ा- अमृतसर पंजाब मेल और हाबड़ा- अमृतसर डुपलिकेट पंजाब मेल, राजेन्द्रनगर- लोकमान्य तिलक बाम्बे जनता, एवं माल्दह टाउन-भिवानी फरक्का एक्सप्रेक्स जैसी ट्रेनों का ठहराव गहमर है। गाजीुपर से बक्सर मार्ग मेन रोड पर स्थ्ति है, गाजीपुर से नीजि बस एवं रोडवेज बस द्वारा पहॅंुचा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि गहमर के लोगो ने केवल वीरता एवं साहित्य के क्षेत्र में आगे रहें है गहमर गॅाव ने गाजीपुर जिले को दो स्र्वगीय विश्वनाथ सिंह गहमरी एवं मान्धाता सिंह के रूप में दो सांसद एवं एक विधायक भी दिया। जिसमें विश्वनाथ सिंह गहमरी द्वारा पूर्वांचल की दुव्र्यवस्था पर दिये गये व्याख्यान ने तल्कालिन प्रधानमंत्रि पंडित जवाहर लाल नेहरू को रोने पर विवश कर दिया।

 

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