सरिता का शक

नौकरी हाल में ही लगी थी ,नौकरी पा कर वो बहुत ख़ुश था ,नयी नौकरी ,नयी बीबी ,ज़िन्दगी मस्त कट रही थी ।अगर आफ़िस में कोई तकलीफ़ थी तो वो था उसका कड़क बौस जो बात बात पर उसे झिड़क देता ,एक एक मिनट का हिसाब पूछता ,फिर भी बस चल रही थी ।आफिस में फोन लाना मना था ,तो जबभी उसकी नयी नवेली दुल्हन ( रमा) का फ़ोन आता तो बौस के कमरे में ही आता ,उसने रमा को बहुत बार मना किया कि बेकार का फ़ोन ना किया करें पर वो मानती ना थी ।खैर धीरे धीरे रमा का फ़ोन आना लगभग बन्द हो गया और उसने भी राहत की सास ली ।बौस जो बहुत ही सख़्त हुआ करता था ,उससे काफ़ी नरमी से पेश आने लगा ,पर रमेश के मन में हमेशा भय बना रहता ।इधर कुछ दिनों से उसने नोटिस किया था कि बौस लंच के बाद दो घन्टे के लिये कहीं ग़ायब हो जाता है ,उसका शक था कि वो दो घन्टे के लिये अपने घर जाता होगा ,अच्छी बात थी दो घन्टे सभी कर्मचारी राहत की सास लेते ,ख़ूब हँसी मज़ाक़ चलता ।इन दिनों रमा भी ख़ूब अच्छे मूड में रहती ।यह सिलसिला चलता रहा ,अब रमेश को पक्का शक़ हो गया कि बौस दो घन्टे के लिये रोज़ अपने घर जाता है ,क्योंकि जब भी वो लौटता तो बहुत अच्छे मूड में रहता ।रमेश की भी बड़ी इच्छा होती वो भी ,दो घन्टे का समय रमा के साथ बिताये,बौस को पता भी ना चलेगा और रमा भी ख़ुश हो जायेगी ।एक दिन बहुत ही हिम्मत कर वो बौस के जाने के बाद अपने घर को निकला ,घर पहुँच कर उसने देखा बौस की गाड़ी उसके घर के सामने लगी है ,डर के मारे उसका बुरा हाल ,उल्टे पाँव वो आफिस लौट आया । दोस्तों ने पूछा क्या हुआ ? अरे यार बौस वहाँ भी मिल जाता ,और आफिस समय से पहले छोड़ने पर बहुत डाँटता ,वो तो अच्छा हुआ ,बौस ने मुझे देखा नहीं और मैं जान बचा कर भागा ।सारे दोस्त ठहाके लगाने लगे ,शक़ कहीं का था ,निशाना कहीं और लग रहा था ।
रमेश अवाक् सा सबो को देखता रह गया ।।

स्वरचित
डा सरिता नारायण

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