सरिता का झूठ का व्यापार

क्या होती है रीति रिवाज,नहीं मालूम था उस दस साल की बच्ची कमला को । उसका संसार एक छोटी सी कुटिया नुमा घर ,एक शराबी पिता -जो आये दिन मार पीट करता ,एक माँ जो सारा दिन पागलो की तरह काम करती और एक छोटा भाई जिसके जन्म के बाद इसने स्कूल जाना छोड़ दिया ।भाई से कमला को नफ़रत होती ,उसने उसका स्कूल छुड़वा जो दिया था ।शनिवार के दिन माँ काम पर नहीं जाती ढेर सारे नींबू और हरी मिर्च ख़रीद कर लाती ,सुई धागा से एक नींबू और कुछ हरे मिर्च को जल्दी जल्दी पिरोती और फिर तीनों चल देते उसे बेचने ,भाई कभी उसकी गोद में तो कभी माँ की गोद में ।शराबी पिता घर में ही पड़ा रहता ।
सिग्नल पर अच्छी बिक्री हो जाती ,क़रीब क़रीब सभी लोग जो रूकते वो ख़रीदते दस का एक ,दस का एक ।
पर ये लोग क्यूँ लेते है कमला को समझ ना आता , एक दिन उसने अपनी माँ से पूछा तो माँ ने बताया कि इसे घर के बाहर लगाने से किसी की नज़र नहीं लगती , घर में सुख सम्रद्धि आती है । लोग कमला से ख़ूब नींम्बू की डली ख़रीदते , कुछ ऐसा वहम हो गया था का कमला की डली ज़्यादा प्रभावशाली होती है । कमला और उसकी माँ के दिन ग़रीबी में ही सही ठीक ठाक कट रहे थे ।।
कमला दस साल की बच्ची ,मन में तरह तरह के सवाल उठते जब उसकी ये डली लोगों पर इतनी प्रभावशाली है तो उसमें क्यूँ नहीं , वो लोग तो अभी भी झोपड़ी में रहते है , माँ दूसरे के घरों में काम करती है , पिता सारा दिन शराब पी लुढ़का रहता है , आख़िर ऐसा क्यूँ ?
एक दिन अचानक उसके भाई को तेज़ बुखार आने लगा , नुक्कड़ वाले डाक्टर ने कहा निमोनिया का शक है पास वाले बड़े अस्पताल में जाना होगा । माँ बच्चे को ले कर अस्पताल चली गयी तथा कमला को बोला -तू अकेले जा कर सारे डली (( मिर्ची और निम्बू )) को बेच आ , कुछ पैसे तो चाहिये ही दवाइयाँ ख़रीदनी होगी । ये कमला के लिये कोई कठिन काम ना था , कई बार पहले भी उसने ऐसा किया था ।
पर आज ना जाने उस बालमन को क्या सूझा उसने सारे डलिया अपने घर के चारो ओर लगा दिया , उसे लगा ऐसा करने से उसका भाई बिल्कुल ठीक हो जायेगा , कोई बुरी नज़र उसके घर की ओर नहीं झांकेगी ।
शाम माँ घर आयी और पैसे माँगने लगी पर कमला के पास एक पैसा ना था , उसने माँ को कहा कुछ नहीं होगा भाई को ,उसने भाई की हिफ़ाज़त के सारे इन्तज़ाम कर दिये है । माँ अवाक् , अब सुबह के इन्तजार के अलावा कोई चारा ना था , जब वो किसी से उधार ले दवाइयाँ ला सके । पर वो रात बहुत भारी पड़ी , रात के तीसरे पहर बच्चे की सांसे उखड़ गयी ।
माँ रोये जा रही थी और साथ ही साथ कमला को पीटे जा रही थी ।
कमला अवाक् कभी अपने भाई को देखती , कभी निम्बू और मिर्चें की डली को देखती , कभी रोती चिल्लाती माँ को देखती ।
उससे क्या ग़लती हुई ,उसे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था ।

तो क्या आजतक वो झूठ का व्यापार कर रहे थे ?
और कमला ज़ोर ज़ोर से रोने लगी ।

स्वरचित
डा सरिता नारायण

२०/८/२०१८

1 thought on “सरिता का झूठ का व्यापार”

  1. Dr. Jyoti Mishra कहते हैं:

    बेहद मार्मिक, कटु सत्य 1

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