रिश्तों का सच -: मीनाक्षी

बचपन से ही प्रायः माँ ने जैसे घुटी सी पिला दी थी मीना को की अपनों से बड़ों का सदा ही सम्मान करना चाहिये, उनकी कोई बात अच्छी न भी लगे तो चुप रहते हैं । पर मीना का मन कभी न समझ पाता न ही मान पाता । वो अक्सर जब देखती माँ कभी भी किसी बात को विरोध ही नहीं करती थी , हमेशा चुप ही रहती चाहे वो अपने पति की कोई बात हो, किसी करीबी रिश्तेदार की या आस पड़ोस में ।
माँ का ये व्यवहार मीना के गले नहीं उतरता था और समय के साथ जैसे जैसे उम्र बढ़ने लगी उसका मन विद्रोह और रोष की अग्नि में जलने लगा। आखिर क्यों चुपचाप सहना, क्यों हक नहीं अपना मत, अपनी बात कहने का , इंसान हैं कोई मूक पशु थोड़ा ही जो खूंटे से बंधे बस कराहते रहें।
वो अक्सर ये बात माँ से भी कहती और माँ बस प्यार से गाल सहला देती “अभी वक़्त लगा समझने में तुम्हें’। और मीना विफर उठती माँ ये क्या बात हुई जो गलत है वो गलत ही है न , चुप रहने से सही हो जाएगा क्या? पर माँ के साथ मीना की कोई दलील कभी काम न आती।
देखते ही देखते उम्र बढ़ रही थी और वहीं लोगों की आवाज़ें “अरे भई सारी उम्र घर बिठा कर रखना है क्या” और मीना चिढ़ सी जाती अपने ही घर में थी न उन लोगों के तो नहीं । हर दूसरे से दिन कोई न कोई अपना तर्क, अपना नुस्खा, अपना टोटका लेकर घर चला आता मानो सारा जहां पीछे ही पढ़ गया था मीना के और जब माँ मीना के चेहरे पर गुस्से की लकीरें देखती वो आँखों से इशारा कर शांत कर देती और इस तरह उसका विद्रोह ज्वालामुखी बनता जा रहा था और अंदर ही अंदर बहुत तकलीफ दे रहा था।
एक दिन आखिर वही हुआ जिसका डर था। राखी का दिन था मीना काफी उत्सुक थी अपना नया सूट, मैचिंग चूड़ियाँ, हाथों में मेहंदी खूब खुश थी और माँ की भी पूरी मदद कर रही थी रसोई में । सब ठीक चल रहा था राखी बांधी, नाश्ता परोसा और चाय वगेरा सब अच्छे से निपट गयी । और तभी हर साल की तरह उसकी भुआ ने शादी की बात शुरू कर दी , पिता भी उनके सुर में सुर मिलाते शुरू हो गये । भुआ जी और उनके पति , मीना के पिता की बातें मीना को विचलित कर रही थीं ” हर चीज़ वक़्त, नियम के साथ अच्छी लगती है, दिन त्योहार पर बेटियाँ अपने ससुराल से आती ही अच्छी लगती हैं” , “इतनी उम्र में तो खड्डा खाना पड़ेगा जो भी रिश्ता मिले समझौता करना पड़ेगा” “चाहो कोई तलाकशुदा हो या बाल बच्चे वाला” अब सोचने,समझने और खोजने का समय गया । घन्टे भर से ज़्यादा हो चुका था मीना को हर साल, हर त्योहार की तरह सुनते हुए सब “तभी सबकी उपेक्षा के विपरीत मीना विफर उठी -क्या हर त्योहार पर दिल दुखाना ज़रूरी है, एक ही बात बार बार हर बार कह कर जताना ज़रूरी है , और जो जो मीना के दिल में था वी रोते रोते कहती चली गयी जब तक उसके गालों पर ज़ोर ज़ोर से माँ ने न जाने कितने चांटे जड़ दिए और मीना को खींच कर ले जा कमरे में बंद कर दिया।
मीना माँ के इस व्यवहार से अचंभित थी और रो रो के बेहाल थी । उतना दर्द उसे मार का नहीं हो रहा था जितना *खोखले रिश्तों की सच्चाई पर* अपनी माँ ने दूसरों के लिये इतना मारा और अपने पिता के मुँह से एक लफ्ज़ भी नहीं निकला और न ही किसी और के। क्या सच में इस कड़वे व्यवहार की हकदार थी मीना ? क्या कुसूर था उसका? रो रो के यूँ पूरा दिन बिता न कुछ खाया, न पिया , हाथों की मेहंदी, रंग बिरंगी चूड़ियाँ भी जैसे उपहास उड़ा रही थीं । इस पूरे प्रकरण से सबसे ज़्यादा मन टूटा तो वो अपने माँ के व्यवहार से वो तो उसकी अपनी थी फिर भी मीना की पीड़ा समझ न पाई और सबके सामने यूँ सज़ा दी “क्या गलत कहा था उसने” सोचते सोचते रोते रोते यूँ पूरा दिन उस कमरे में बंद बित गया । सब बाहर सामान्य थे कोई टूटा था, बिखरा था उस दिन तो सिर्फ “मीना” ।
आज इस घटना को 20 साल से ऊपर हो चुके फिर भी हर साल मीना अपने पति और बेटे के साथ राखी पर अपने मायके जाती है तो वो ज़ख्म खुद बखुद हरे हो जाते हैं जिसके घाव उसके दिल और गाल पर सदा ही कचोटते हैं गहरे भीतर ही भीतर रिश्तों की दुहाई देते जिनका रंग रूप इतना भयावह भी हो सकता है मीना ने उस दिन जाना था।
*मीनाक्षी सुकुमारन*

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