रिश्तो का सच –; सोनपरी

आज काकी बड़ी खुश थी वो घर का कोना कोना सजाने में जुटी हुई थी आखिर जिस बेटे को पाल पोसकर बड़ा किया अच्छी शिक्षा के लिए विदेश भेजा वो अपनी पत्नी के साथ घर आ रहा था।
किसी चीज की कमी नही थी नोकर चाकर से घर भरा था पर वात्सल्य प्रेम में भीगी काकी आज सब खुद ही करना चाहती थी।तरह तरह के पकवान बेटे का मन पसन्द गाजर का हलवा,प्याज की कचौरिया,गोभी के पराठों की खुशबू से पूरा घर महक रहा था।
तभी गाड़ी की आवाज ने काकी के कान खड़े कर दिए काकी दौड़ती हुई दरवाजे पर गई देखा तो बेटा और बहू दोनो गाड़ी से उतर कर घर आने लगे काकी ने उनको रोककर श्यामू को आवाज लगाई।श्यामू ओ श्यामू वो आरती का थाल तो ला’बहु पहली बार घर आ रही है।
जी काकी अभी लाया कहकर श्यामू पूजा की थाली ले आया।काकी ने दोनों की आरती उतारी व ग्रह प्रवेश के लिए स्वीकृति दे दी।स्वीटी ने इशारे में पूछा ये कौन है???काकी ने जैसे ही बोलने के लिए मुँह खोला राहुल तपाक से बोला-अरे ये!ये तो हमारी सबसे पुरानी नोकरानी है जिसने मुझे बेटे की तरह पाला है।और माताजी कहाँ है दिखाई नही दे रही?? स्वीटी ने फिर सवाल किया।
राहुल;-अरे!तुम्हे बताया तो था मेरी माँ को गुजरे हुए जमाना बीत गया मुझे तो उनकी शक्ल तक याद नही।
ये सब सुनकर काकी के पैरों तले से जमीन खिसक गई चाहकर भी अपनी गंगा जमुना को बहने से नही रोक पाई और रोते हुए घर से निकल गई।सोचते हुए की मैने बेटे को शिक्षा तो दे दी पर रिश्तों की अहमियत नहीं सीखा पाई।तभी काकी तेज़ रफ़्तार से आती हुई गाड़ी को टकरा गई और वहीं उसकी सांसे छूट गई।

रानी सोनी”परी

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