मीना छाबड़ा की उलझन

ले सुगंधा … तेरे धर्मभाई वीरेंद्र की चिट्ठी । दूर के रिश्ते की एक बहन ने एक लिफ़ाफ़ा सुगंधा के हाथ में रखते हुए कहा … मेरे लिए ?? सुगंधा थोड़ा हैरान होते हुए बोली क्योंकि उस भाई ने सालों से न ख़बर ली न दी थी ……हाँ चार दिन पहले उसका देहांत हो गया । मरने से पहले उसने ये पत्र तेरे नाम लिखा था और कहा था कि तुझे दे दूँ । मुझे पत्र पहुँचाने में थोड़ी देर हो गई । अच्छा चलती हूँ। सुगंधा धम्म से फ़र्श पर बैठ गई । कुछ देर दिल का ग़ुबार आँसुओं में निकालने के बाद उसने पत्र खोला …. प्यारी सुगंधा .. बहुत बहुत प्यार और आशीर्वाद … समझ नहीं आ रहा कैसे शुरू करूँ ?? क्या कहूँ?? कैसे तुमसे माफ़ी माँगू?? … मगर अब ये बोझ अपनी आत्मा पर ले कर मैं मर नहीं सकता । आज एक सच तुम्हें बताना चाहता हूँ कि मैंने कभी तुम्हें बहन नहीं माना … मेरे दिल में पाप था .. तुम मुझे अपना भाई मानती रहीं ..मगर मैं ……..पर अब जब मुझे मालूम है कि मेरी ज़िंदगी के कुछ दिन ही शेष हैं तो मैं इस बोझ को लेकर मरना नहीं चाहता …. तुम्हारे पवित्र प्यार का मैंने हमेशा अपमान किया । तुमने एक छोटी बहन की तरह लाड़ किया ,राखी बाँधी और मैं पापी …मेरे मन में कुछ और ही था …मैंने उस राखी के पवित्र बंधन को दाग़दार किया । इसीलिए जब तुमने अपनी पसंद के लड़के से शादी की तो मैंने तुमसे दूरी बना ली ..तुम कई बार मिलने आईं पर मैंने घर में होते हुए भी कहलवा दिया कि घर पर नहीं हूँ…धीरे -धीरे शायद तुम्हें ये अहसास हो गया और तुम भी अपने घर परिवार में व्यस्त हो गईं। तुम्हारी राखियाँ तक मैंने वापिस भिजवा दीं और तुम्हें दुखी किया । शायद यही वजह थी कि तुम्हारा …बनाए हुए रिश्तों पर से विश्वास उठ गया । जानता हूँ मेरा अपराध माफ़ी के लायक नहीं पर फिर भी …हो सके तो मुझे माफ़ कर देना । पिछले दस सालों से मैं पश्चाताप की अग्नि में जल रहा हूँ …तुम्हारे सामने आकर तुमसे माफ़ी माँगने की हिम्मत नहीं जुटा पाया ….. प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो ……सुगंधा की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे ?? एक पश्चाताप में जलती आत्मा को शांति पहुँचाए या … रोए कुछ पुरुषों की ऐसी मानसिकता पर जो एक लड़की और एक लड़के को सिर्फ़ एक ही नज़र से देखते हैं …..वासना की

मीना छाबड़ा
फ़रीदाबाद (हरियाणा)

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