संसार में मानवीय विस्तार करेंगी लघुकथा संग्रह एक लोहार की: कान्ति शुक्ला।

श्री घनश्याम मैथिल अमृत का सद्य प्रकाशित और लोकार्पित लघुकथा संग्रह भेंटस्वरूप प्राप्त हुआ । संग्रह की समीक्षा मेरे विचारानुसार प्रस्तुत है.-
साहित्य में मानव जीवन के समस्त पहलुओं की विवृत्ति होती है और यही सम्बंध- सूत्र परिस्थितियों को जोड़कर रखता है । साहित्य किसी भी विधा के रूप में हो, हमारे जीवन की आलोचना करता है। हमारा जीवन स्वाभाविक एवं स्वतंत्र होकर इसी के माध्यम से संस्कार ग्रहण करता हुआ, अपनी मूकता को भाषा प्राप्त करता है । भावनिष्ठ वस्तुनिष्ठ वैयक्तिक भावनाओं को नैयक्तिक रूप देकर अंतर के अनुभूत सत्य को सूक्ष्म पर्यवेक्षण द्वारा प्रकट कर स्थायित्व प्रदान करता है ।
साहित्य में गद्य की अन्य विधाओं यथा कहानी , उपन्यास , नाटक , लेख आदि के अतिरिक्त लघुकथा लेखन भी एक सशक्त विधा के रूप में भलीभाँति स्थापित हो चुका है और लघुकथाओं की लोकप्रियता शिखर पर है । समयाभाव के चलते कम समय में सार्थक संदेश देतीं लघुकथाओं के असंख्य पाठकों की गहन रुचि के कारण लघुकथा की विधा साहित्य में आज अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ किए है। लघुकथा से आशय मात्र इसके लघु कलेवर से नहीं वरन् लघु में विराट के यथार्थ और कल्पना बोध को आत्मसात कर क्षण विशेष की सशक्त अभिव्यक्ति का प्रभावोत्पादक प्रखर प्रस्तुतीकरण है जिसमें शिल्पगत वैविध्य है, प्रयोगधर्मी स्वरूप है, कथ्य और प्रसंगों की उत्कटता का सहज और प्रभावपूर्ण संंप्रेषण है ,विषय वस्तु का विस्तार न करते हुए संक्षिप्त परिदृश्य में सार्थक संदेश व्याख्यातित करने का कठिन दायित्व है ।
‎आज आवश्यकता और अस्तित्व से जुड़ीं इन लोकप्रिय लघुकथाओं के मनीषी कथाकार अपनी संपूर्ण प्रतिभा से आलोक विकीर्ण करते हुए सक्रिय हैं।
इन विद्वान लघुकथाकारों ने अमिधा की शक्ति को पहचाना है । व्यंजना और लक्षणा से नवीन आख्यान निर्मित किए हैं और लिखी जा रहीं लघुकथाएं जनसम्बद्धता , प्रतिबद्धता और पक्षधरता की कसौटी पर खरी उतर रहीं हैं, अपने प्रभावी कथ्य, शिल्प सौष्ठव और सौन्दर्य बोध द्वारा विशेष सराहीं जा रहीं हैं जिनके लेखकों की अपनी- अपनी शैलीगत विशिष्टताएं हैं । इसी कड़ी में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न कवि, समीक्षक ,कथाकार श्री घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ का लघुकथा संग्रह “——–”
का प्रकाशन हर्ष का विषय है । उक्त कथा-संग्रह में विविधवर्णी लघुकथाएं संग्रहित हैं। ये लघुकथाएं समाज की विडम्बनाओं का दर्पण हैं। कथ्य, भाव बोध, विचार और दृष्टि मनुष्य और उसकी विवशता की सार्वभौमिक सच्चाई को प्रकट करतीं उसकी हर योजना, भाव, संवेदना, आचरण, व्यवहार, चरित्र, भ्रष्टाचार, संवेदनहीनता और सामाजिक यथार्थ की पृष्ठभूमि में मानव- प्रकृति, आर्थिक उपलब्धि, अभाव, विचलन और विस्मय के बहुमुखी यथार्थ को अनेक स्तर पर व्यक्त कर रहीं हैं । इन कथाओं के आइडियाज आस पास के परिवेशानुसार लिए गए हैं जिनमें सामाजिक संवेदना, चेतना और जागरूकता है । लघुकथा ‘कागजी घोड़े’
सरकारी विभागों की तथाकथित सच्चाई बयान करती है तो ‘ ज़िंदगी की शुरुआत’ पुलिस की हठधर्मी और संवेदनहीनता को व्यक्त करती है । ‘ अपना और पराया दर्द’ में मनुष्य की कथनी और करनी का अंतर स्पष्टतया परिलक्षित होता है तो ‘विकलांग कौन’ अदम्य साहस और जिजीविषा की सशक्त कथा है । संग्रह की अधिकांश कथाएं भ्रष्टाचरण, स्वार्थपरता, सामाजिक पारिवारिक विसंगतियों और विकृतियों को केंद्र में लेकर रचीं गईं हैं क्योंकि कथाकार देश और समाज के प्रति प्रतिबद्ध है, पक्षधर है । सहज और अवसरानुकूल कथा के पात्रों द्वारा कहे संवाद शीघ्र विस्मृत नहीं होते । अर्थपूर्ण कथाओं में अनुभव और यथार्थ की अभिव्यक्ति के विशेष क्षण पाठकों को बांधने की क्षमता रखते हैं । कथाओं के निर्दोष ब्योरे सरलता और सहजता से सामने आते हैं , चौंकाते हैं और सोचने को बाध्य करते हैं । ये बहुआयामी विमर्श के परिदृश्य अपने मन्तव्य को रोचक और प्रभावी ढ़ंग से स्पष्ट कर देते हैं । संग्रह की सभी कथाएं प्रवहमान और संप्रेषणीय हैं जिनकी अन्तर्वस्तु और संरचना में कुछ अनछुए प्रसंग हैं । कथाओं में व्यंजित कलापूर्ण लेखन कौशल में यथार्थ और समय की अनुगूंज है जो लघुकथा के कथ्य , शिल्पगत सौन्दर्य बोध को जीवंत करने में समर्थ है।
समग्रतः भाव, विचार , सार्थक वस्तुस्थिति और तत्क्षण बोधगम्यता से प्रभासित ये लघुकथाएं सुधी पाठकों को निश्चित रूप से प्रभावित करेंगी और मानवीय मूल्यवत्ता की प्रवाहिनी बनकर इस स्वार्थ संकुल और स्वकेन्द्रित हो रहे संसार में मानवीय विस्तार करेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है । इसी गहन आश्वस्ति के साथ मैं अपने ह्रदय की समस्त मंगलकामनाएं अर्पित करते हुए श्री घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ के सुखी, स्वस्थ और यशस्वी दीर्घ जीवन की कामना करती हूँ । इति शुभम्

‎ . . कान्ति शुक्ला
‎ भोपाल

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