वाराणसी में मना उत्सव। दिल्ली तक खनक।

हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली और प्रगतिशील लेखक संघ, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में ‘वाराणसी व्यंग्योत्सव’ – 2018′ का बेहद शानदार आयोजन रामछाटपार शिल्प न्यास, सामने घाट, बीएचयू, वाराणसी के सभागार में दिनांक 19 मई 2018 को किया गया। यह आयोजन तीन सत्रों में सम्पन्न हुआ।इस आयोजन में देशभर से पधारे जाने-माने व्यंग्यकारों ने सक्रिय भागीदारी की।आयोजन के प्रथम सत्र में डॉ. रमेश तिवारी द्वारा संपादित और हिंदी साहित्य निकेतन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘व्यंग्य सप्तक’ का लोकार्पण हुआ और पुस्तक पर चर्चा की गई।वाराणसी व्यंग्योत्सव – 2018 के मुख्य आयोजक और हिंदुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली के अध्यक्ष श्री सुधाकर पाठक ने अपने वक्तव्य द्वारा सभी उपस्थित विद्वानों, श्रोताओं का स्वागत किया। लोकार्पित पुस्तक के संपादक डॉ. रमेश तिवारी और सम्मिलित लेखकों को साधुवाद देते हुए आगे भी बेहतर लेखन के लिए शुभकामनाएं दीं। इन्होंने व्यंग्य के साथ-साथ भाषाओं पर ध्यान देने की बात पर जोर देते हुए यह चिन्ता व्यक्त की कि भाषाओं की दृढ़ता से ही साहित्य और उसकी विधाओं की दृढ़ता सम्भव हो सकती है।विशिष्ट वक्ताओं में डॉ. संतोष भदौरिया ने जोर देकर कहा कि व्यंग्य करना असहमत होना है।व्यंग्य आपकी पक्षधरता तय करता है। डॉ. प्रभाकर सिंह ने कहा कि व्यंग्य का लोक से गहरा रिश्ता होता है, इसीलिए व्यंग्य में लोक संवेदनाओं के स्वर परिलक्षित होते हैं। व्यंग्य-सप्तक में संकलित डॉ. शशि कुमार सिंह की रचना के एक अंश को उद्धृत करते हुए लोकार्पित पुस्तक की महत्ता को भी डॉ.प्रभाकर सिंह ने भली-भांति रेखांकित किया। उर्दू के साहित्यकार असराग दांगी ने कहा कि उर्दू में व्यंग्य पहले दर्जे की चीज नहीं मानी जाती, बावजूद इसके व्यंग्य की लोकव्याप्ति से शायद ही कोई इंकार करे। गाजियाबाद, उ.प्र. से पधारे वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री श्रवण कुमार उमर्लिया ने व्यंग्य सप्तक में संकलित रचनाओं की गुणवत्ता पर प्रकाश डालते हुए यह संदेश दिया कि व्यंग्य की गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं होना चाहिए। इस प्रकार के कार्यों के लिए जो दृष्टि अपेक्षित है, वह डॉ. रमेश तिवारी की संपादन कला में भली-भांति अनुस्यूत है। आज ऐसे अनेक ईमानदार और महत्वपूर्ण प्रयासों की आवश्यकता है। इन सबके लिए सूक्ष्म दृष्टि की जरूरत है। डॉ. तिवारी और सभी सम्मिलित रचनाकारों को उर्मलिया जी ने शुभकामनाएं भी ज्ञापित कीं। दिल्ली से पधारे ‘हिंदी व्यंग्य का इतिहास’ के लेखक और व्यंग्यालोचक श्री सुभाष चंदर के अनुसार हमारे यहाँ धार्मिक स्थितियों पर व्यंग्य का अभाव है। अपने संक्षिप्त परंतु महत्वपूर्ण वक्तव्य में सुभाष चंदर ने सभी सम्मिलित रचनाकारों की लेखन शैली व क्षमताओं पर भी प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता के रुप में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रो. राजकुमार ने कहा कि ‘व्यंग्य और हास्य की विभाजन रेखा तय करना सम्भव नहीं हो पाता और व्यंग्य के लिए सृजनात्मक भाषा का होना जरुरी है । इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय के पूर्व डीन कुमार पंकज ने कहा ‘व्यंग्य के भीतर की उक्तियाँ देशज और तद्भव में होने के कारण व्यंग्य रचना का अनुवाद सम्भव नहीं । व्यंग्य सप्तक पर अपनी बात रखते हुए डॉ. कुमार पंकज ने संपादक डॉ. रमेश तिवारी और सभी सम्मिलित रचनाकारों को बधाई देते हुए कहा कि अज्ञेय ने भी जब तारसप्तक का संपादन किया तो उसमें खुद को सम्मिलित करने का लोभ संवरण नहीं कर पाए। इस दृष्टि से डॉ. तिवारी यदि व्यंग्य नहीं लिखते हों, तब तो ठीक है किन्तु यदि ये व्यंग्य लिखते हैं और उसके बावजूद ऐसे संग्रह में स्वयं को सम्मिलित करने के लोभ-मोह से बचे रह सके हैं, तो इनकी निस्पृहता की मैं दाद देता हूँ। बड़ी-बड़ी हस्तियों के लिए भी ऐसा कर पाना अत्यंत मुश्किल होता है जिसे डॉ. रमेश तिवारी ने सहजता संपन्न कर डाला है।इस सत्र का संचालन डॉ. शशि कुमार सिंह और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिवानी गुप्ता के द्वारा किया गया।द्वितीय सत्र में ‘समकालीन परिदृश्य और व्यंग्य की चुनौतियाँ’ विषय पर विमर्श का आयोजन हुआ जिसमें अध्यक्षता करते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भूतपूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.बलिराज पाण्डेय ने कहा कि ‘सबसे सटीक व्यंग्यकार वह हो सकता है जो न सिर्फ राजनीति, समाज आदि पर व्यंग्य करे बल्कि अपने पर भी व्यंग्य करने में सफल हो सके।मुख्य वक्ता के रूप में प्रो.अवधेश प्रधान ने कहा कि ‘आज व्यंग्य की चुनौती है कि व्यंग्य में खतरा नहीं रह गया है, उसमें डर नहीं। व्यंग्य एक स्पिरिट है, यह किसी भी साहित्यिक विधा में उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।विशिष्ट वक्ताओं में डॉ. गया सिंह ने कहा कि व्यंग्य को एक अलग विधा में लें तभी उसका महत्व समझ में आयेगा। व्यंग्यकार व आलोचक सुभाष चंदर ने व्यंग्य को विधा के रूप में स्वीकार किए जाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विधा के रूप में व्यंग्य को स्वीकारते ही विधान की आवश्यकता पड़ेगी और विधान की खोज एवं निर्मितियों के अध्ययन-परिमार्जन में जो मेहनत लगेगी उससे जान बचाने के लिए व्यंग्य को विधा के तौर पर स्वीकार करने में कतिपय विद्वान संकोच करते हैं। यह जो व्यंग्य नाम की विधा है इसकी पठनीयता टूट रही है यह आज की चुनौती है,बदल रही परिस्थितियों के साथ हमें व्यंग्य के टूल बदलने की जरूरत है।डॉ एम.पी.सिंह के अनुसार व्यंग्यकार की यह भूमिका होती है कि वह अपनी कलम का उपयोग अपने समाज, अपने वतन के लिए करे।श्री सुधाकर पाठक ने कहा कि जहाँ निराशा शासन-प्रशासन की तरफ से बढ़ जाये वहाँ हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है,पाठक वर्ग पैदा करना भी साहित्य और भाषा का चिन्तनबिंदु होना चाहिए।इस सत्र का संचालन दिल्ली से पधारे डॉ. रमेश तिवारी और धन्यवाद डॉ.नीरज खरे द्वारा किया गया।तृतीय सत्र में रचनापाठ का आयोजन किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. काशीनाथ सिंह द्वारा की गयी।काशीनाथ जी ने अपनी रचना-पाठ के साथ हरिशंकर परसाई की सूक्तियों का भी पाठ किया,उन्होंने कहा कि व्यंग्य एक स्वतंत्र विधा है।आमंत्रित रचनाकारों में अलकबीर (वाराणसी),अलंकार रस्तोगी(लखनऊ),संतोष त्रिवेदी(दिल्ली),अनूपमणि त्रिपाठी (लखनऊ),शशिकांत सिंह’शशि'(नांदेड़, महाराष्ट्र),रमेश तिवारी(दिल्ली),एम.पी सिंह,बलिराज पाण्डेय,आनन्द तिवारी,अरुण कुमार श्रीवास्तव, नीरज खरे,विभांशु केशव,अशोक आनन्द(सभी वाराणसी), डॉ. विनोद मिश्र’कैमूरी’, कवि मुनेश,(सासाराम), डॉ.शशि कुमार सिंह (मायाबंदर, अंडमान-निकोबार), हरिराम द्विवेदी ‘हरि भइया’ आदि ने रचना पाठ से समां बांध दिया। इस सत्र का संचालन डॉ. संजय श्रीवास्तव और धन्यवाद रिपुंजय सिंह द्वारा किया गया। पूर कार्यक्रम के दौरान गहमर वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अखंड गहमरी ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।उल्लेखनीय है कि ‘वाराणसी व्यंग्योत्सव-2018’ बनारस का पहला आयोजन है जो व्यंग्य पर पूरी तरह केंद्रित रहा, बनारस में इस प्रकार के प्रथम आयोजन के लिए हिंदुस्तानी भाषा अकादमी दिल्ली और प्रगतिशील लेखक संघ वाराणसी की जनसामान्य द्वारा बहुत सराहना की जा रही है।

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