परिचर्चा सं0 7- तड़पते किसान और सरकार ‘ हेमलता गोलक्षा

किसी भी देश का सत्त विकास कृषि के बिना संभव नहीं है। कृषि और किसान का देश के उत्थान मे महत्वपूर्ण भूमिका  रहती है।  एक खुशहाल देश की नींव कृषि क्षेत्र का विकास और उत्पादन से लगाया जा सकता है। हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि इस की आबादी और पैदावार  दोनों के मध्य अधिक आंकडों का फासला केवल इसी कारण है कि कृषि पद्धति बहुत पुरानी है।  कृषक सुशिक्षित नही है, नवीन उपकरणों की जानकारी सरकार द्वारा उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है। हालाँकि कुछ क्षेत्रों में सरकार कार्यों व आधुनिक तकनीकों से खासा लाभ प्राप्त हुआ है। हमारे देश का  पोषण किसान बडी यातनाओं से अपना जीवन यापन करता है। उसकी आर्थिक स्थिति दयनीय होती है। कृषको के समुचित विकास  के लिए सरकार ने कई बार ठोस  कदमों को उठाया। आजादी के बाद पंडित नेहरू ने की योजनाओं को लागू किया। श्रीमती इंदिरा गांधी ने उर्वरा शक्ति की बढ़ोतरी के लिए उतम नस्ल बीजों का प्रयोग व खाद के  प्रयोग पर बल दिया। कई योजनाएं को  लागू  किया, जिसका सार्थक परिणाम रहा। किंतु किसानों  समुचित लाभ नही  प्राप्त हुआ। सरकार द्वारा कृषि कल्याण मंत्रालय का गठन किया गया है। पंच वर्षिय योजनाओं को जोगतिशीलता दी।वतर्मान मे भी किसानों की समस्याओं का निदान नही हो पाया है। कृषको  को  अपनी समस्या से झुकते हुए आत्मदाह या खुदकुशी तक करने के लिए मजबूर होना पड़ता है ।समुचित  पानी की  सप्लाई का न होना, प्रकृति का प्रकोप, सूखा, फसलों का नष्ट होना आदि अनेक ज्वलंत समस्याएं हैं। हाल ही में राजस्थान  के किसानों ने सरकार से तंग आकर  सडको पर उतर आए। उसके बाद सरकार ने उनका ऋण माफ किया। उतरप्रदेश में आलू की पैदावार करने वाले किसानों ने करोड़ो मात्रा मे आलूओ को कूड़े मे फैंक अपनी नाराजगी से सरकार से मुहाया करवाया।

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