परिचर्चा सं0 7- तड़पते किसान और सरकार” नमिता दूबे”
भारत एक कृषि प्रधान देश है पर कृषक और खेती-किसानी के लिये हमारे देश में बहुत कम काम हुआ है| नयीं तकनीक का अभाव,  खेती के लिये आज भी बारिश पर निर्भरता, मिट्टी की गुणवत्ता की जांच न करा पाना इत्यादि बहुत से कारण हैं कि किसान को उसकी मेहनत का वाजिब परिणाम नहीं मिलता और वह कर्ज में डूब जाता है | कर्ज ना चुका पानें की स्थति में कभी-कभी वो तनाव का शिकार हो आत्महत्या कर लेता है | शहरों का फैलाव, जिससे कृषि भूमि पर भी क्रंक्रीट का जंगल उगता जा रहा है! किसान को भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में मजदूरी कर परिवार पालना ज्यादा पसन्द आ रहा है | सरकार योजनायें बहुत बनाती है पर उनका क्रियावरण नहीं हो पाता परिणाम विमुखता या पलायन |खेती की नयीं तकनीक का आम किसान तक ना पहुंचना, उन्नत बीज का ना मिलना, कर्ज की विभिषिका का जीवन निगलना| योजनाओं का सम्बन्धित व्यक्ति को लाभ ना मिलना | अव्यवस्थायें और भ्रष्टाचार जिसनें ‘जय किसान’ को बेबस बना दिया है |अन्नदाता मायूस है | लोग जमीन बेच रहे हैं या किसी योजना के तहत उनकी जमीन अधिग्रहण की जा रही हैं | सरकार की तरफ सें फसलों की कीमत कम मिलना और समय पर पैसा ना मिलना, प्राकृतिक या अन्य कोई दुर्घटना में बीमा रकम का नहीं मिलना अनेक ऐसे कारण है कि वास्तविक मेहनतकश किसान अपनी माटी से दूर होता जा रहा है |सरकार को किसानों के लिये समृद्ध योजनायें बनानी चाहिये और ये सुनिश्चित करना चाहिये कि उनका लाभ वास्तविक व्यक्ति को मिले| सबकी थाली सजानें वाला यदि भरपेट खाना ना खा पाये तो लानत है समाज पर |
 सरकारी योजनायें केवल कागज पर ही नहीं हकीकत में परिणाम देनें वाली होनी चाहिये | जिस समाज में किसान को सम्मान नहीं मिलेगा उसका पतन सुनिश्चित है | विकास केवल कारखानों और बडीं ईमारतों में नहीं बसता बल्कि एक खुशहाल समाज खेतों के रास्ते तरक्की करता है | निराश हो कर आत्महत्या करते किसानों को अनदेखा करना अपनें पैरों में खुद कुलहाड़ी मारना हैं | इस हकीकत को स्वीकार कर सरकार को अपनी नीतियों में सकारात्मक परिवर्तन करनें होंगे ||||
नमिता दुबे

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