परिचर्चा सं0 7- तड़पते किसान और सरकार” शिवानंद चौबे

कृषि प्रधान देश भारतवर्ष में यदि अन्नदाता ही आत्महत्या करने को विवश है तो निश्चय ही यह इस देश के लिए शर्मनाक बात है !हम शायद यह बात भूल जाते है की हम कितने भी धनी हो जाए ,हमारी थाली स्टील .पीतल .सोने .या चांदी की हो सकती है मगर रोटी तो आते की ही होगी !शीत.गर्मी .वर्षा .की परवाह किये बिना दिन रात कठिन परिश्रम करते हुए एक किसान हम सबके लिए अन्न उगाने का कार्य करता है !आये दिन हम देख रहे है की हमारे अन्नदाता मौत का वरण करने पर मजबूर हो रहे है !इसके लिए सरकार के साथ साथ हम सब जिम्मेदार है !किसानो के लिए सबसे बड़ी समस्या पैसे को लेकर होती है.जिसके लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ता है !और ज्यादातर किसान  कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या को मजबूर हो जाते है !अतः इसके लिए सरकार को ठोस व् प्रभावकारी कदम उठाये जाने चाहिए !सरकार द्वारा किसानो के हित के लिए अनेको कार्य किये तो जा रहे है लेकिन ये नाकाफी साबित हो रहे है !जिसके लिए अभी और भागीरथ प्रयास की आवश्यकता है !ताकि इनके जीवन में भी खुशियों की होली और दिवाली हूँ !!

(है किसान ये बदनसीब अश्को को अपने पीता है ,
लाचारी बेबसी भाग्य में दुश्वारी में जीता है !!)

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शिवानंद चौबे
जनपद .भदोही
९७९४९३६०२१

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