परिचर्चा सं0 7- तड़पते किसान और सरकार” धीरेन्द्र प्रताप सिंह।

भारत ने बीसवीं सदी के अंतिम दशक में हुए आर्थिक बदलावों (नई आर्थिक नीति-1991) से एक बहुत ही तेज रफ़्तार से इक्कीसवीं सदी में प्रवेश किया. इस तेज रफ़्तार ने सुविधा के नाम पर देश के बड़े हिस्से में जबर्दस्त संकट खड़ा कर दिया. विकास के नाम पर जल, जंगल- जमीन उजाड़े गए. असंतुलित विकास एवं प्रकृति के साथ भयंकर छेड़-छाड़  ने प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दिया. इन परिस्थितियों के फलस्वरूप जहाँ किसानों, मजदूरों एवं लघु उद्योगों की कमर टूट रही थी, वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र के रहनुमा, लूटतंत्र से अपनी जेबें और ज्यादा भरने लगे. भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शोषण के विविध आयामों से लोगों का जीना दुश्वार होने लगा. लचर सरकारी नीतियों और उसके भ्रष्ट कार्यान्यवन से सबसे ज्यादा कोई परेशान, हताश और निराश हुआ तो वह किसान है.यह सच है इक्कीसवीं सदी की जो सबसे बड़ी त्रासदी दिख रही है वो है, अन्नदाताओं (किसान) की आत्महत्या. खेती किसानी से लोगों का मोहभंग. विकिपीडिया पर प्रदर्शित एक आंकड़ें के मुताबिक 1997 से 2006 के बीच ‘एक लाख छियासठ हजार तीन सौ चार किसानों’ ने आत्महत्या की. जो हर साल बढती ही जा रही है. 30 दिसम्बर 2016 को जारी एनसीआरबी के रिपोर्ट ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015’ के मुताबिक साल 2015 में 12,602 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की है.प्रख्यात आलोचक मैनेजर पाण्डेय जी ने ‘कथा में गाँव’ पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि- ‘भारत में दो भारत हैं. पहला भारत दस प्रतिशत अमीरों का है और दूसरा भारत नब्बे प्रतिशत गरीबों का है. दूसरे भारत की 72 प्रतिशत जनता भारत के गांवों में रहती है, जो देश में सबसे अधिक शोषित और उत्पीड़ित है. पहले भारत में भूमंडलीकरण का जश्न मनाया जा रहा है और दूसरे भारत में किसान भुखमरी का शिकार हो रहे हैं तथा आत्महत्याएं कर रहे हैं ’.आज विभिन्न कारणों से जमीनों की कब्जाने की नीति एवं नियत, खेती को अलाभप्रद बनाने के सारे उपक्रम पूंजीवादी ताकतों ने लगा दिया है. पूँजी के बढ़ते प्रभाव से छोटे किसान मालिक से मजदूर बनने की स्थिति में आ चुके हैं.किसानों का यह हाल वर्तमान सरकारी मशीनरी के खिलाफ़ प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दे रहे हैं. सरकार की नीति और नियत से किसानों की दशा दिन- प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है. सबको के लिए अन्न उपजाने वाले किसानों की हाड़ तोड़ परिश्रम को वही अच्छे से समझ सकता है, जो खुद किसान का बेटा हो. तपती दोपहरी हो, लू के थपेड़े हों, हाड़ कंपाने वाली ठण्ड हो, बारिश का जलजला हो या घुप्प अँधेरी रात हर वक्त किसान के लिए जायज है. यह कष्ट वो लोग कैसे महसूस कर सकते हैं जो एसी- कूलर में भी बहुत गर्मी की शिकायत करते हैं. रूम हीटर और जयपुरिया रजाई में भी ठण्ड की लानत- मलानत करते हैं.

मौसम के अनेक मार के बावजूद, उन किसानों का क्या गुजरती है जब समय पर नहरों में पानी नहीं, बिजली नहीं, गोदामों में बीज और उर्वरक नहीं. यदि किसी तरह अन्न पैदा हो गया तो उसका उचित मूल्य नहीं. अन्न भण्डारण की समुचित व्यवस्था नहीं. खेत में फसल की कीमत औने- पौने और कुछ ही दिनों बाद बाज़ार में बेशकीमती. हद तो तब हो जाती है, जब किसानों के जायज मांगों के लिए उनके उपर लाठियां बरसायी जाती है. उनका दमन किया जाता है. आखिर यह सब क्यों और कब तक?

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज भी भारत का पेट इन्हीं जी-तोड़ परिश्रम करने वाले किसानों की वजह से ही भरता है. यदि समय रहते हमारी लोकतान्त्रिक सरकारें किसानों की दशा- दिशा पर कोई ठोस पहल नहीं करती तो इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अनाज में आत्मनिर्भर भारत फिर निर्यात पर निर्भर होगा. भूखमरी और आत्महत्या बढ़ती जाएगी. किसानों के हँसिया- फावड़े और कुदाल खेत खोदने के बजाय इस निर्मम, भ्रष्ट और अराजक व्यवस्था को उखाड़ फेकेंगी.

इसलिए आज जरुरत है- किसानों को समय पर बिजली, नहरों में पानी, उपज अनाज के उचित मूल्य और त्वरित भुगतान, क्रय केन्द्रों पर अनाज के भण्डारण और सुरक्षा, क्रय केन्द्रों की निकटता, सहजता से उपलब्ध होने वाले न्यूनतम ब्याज दर पर कृषि ऋण, भ्रष्टाचार मुक्त और ससमय उपलब्ध होने वाला सरकारी उर्वरक और बीज. जमाखोरी पर अंकुश, खेती की नई तकनीकों से अवगत कराना, प्रत्येक गावों में नियमित कृषि गोष्ठियां आदि. यह कुछ ऐसे उपक्रम है जिस पर ध्यान देकर किसानों की दशा- दिशा को काफ़ी हद तक सुधारा जा सकता है.

धीरेन्द्र प्रताप सिंह

शोध-छात्र (हिंदी), इलाहाबाद विश्वविद्यालय

पता- कक्ष सं. 28, अमरनाथ झा छात्रावास. 211002

संपर्क सूत्र : 09415772386

ई.मेलdhirendrasingh250@gmail.com

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