डाक्‍टर मेनका की काव्‍यधारा।

स्त्रियाँ कागजों जैसी होती है!
मोडो.. मुड़ जाती हैं!
जला दो.. जल जाती है!
गला दो.. गल जाती हैं!
फाड़ दो.. फट जाती हैं!

आमतौर पर रद्दी सी या
पुराने अखबारों की तरह
इस्तेमाल की जाती हैं!
चूल्हे में झोक दी जाती है!

पर यदि आता है सलीका
तो कभी सहूलियत से बरतना
विश्वास स्नेह की स्याही से
गढ़ देना शब्द शब्द
कोमल हिय पर प्यारे
यह साहित्य बनी रामायण
और कृति अनमोल बन जायेगी.
अमर कविता बन तुम्हें गर्व कराएंगी!

पुस्तकों से भी अनमोल होती है स्त्रियाँ

चलिए… छोडिये…. बस मन की बात कही है

वैसे सलीके शब्दों के कागज़ पर एक नया इतिहास रचेगे!

मायके की सीढिया ॥

माँ का दुलार सावन की फुहार
रिमझिम बौछार मॆ धुली -पूछी
नहाई धोई सीढिया !

मार मौसम की सही काई लगी यॆ सीढिया
ऊपर -नीचे ,नीचे- ऊपर मेरे कितने चक्कर
ना मै कभी थकती ना थकती हैं यॆ सीढिया !

बचपन से आज तक मेरे रूठने ,चहकने से
रूठी और चह्की हैं यॆ सीढिया क्यूकि  बचपन
की खुशबू से महकती हैं आज भी यॆ सीढिया !

माँ की आवाज़ ,पिता जी के आने पर
कोमल रूई से पांवों की थाप से बज उठती थी
किसी मृदंग सी यॆ सीढिया !

अब जीवन के उतार -चढाव को गिन लेती हूँ
कभी कभार.मेरे थके हारे क्लांत व्यक्तिव को
फ़िर से उबार- निखार देती हैं यॆ सीढिया !

सुर्ख लाल अशर्फियों से फूल खिला करते हैं
मन मॆ ,जब जब छम- छम  आती हूँ मायके
स्वागत कर बिछ -बिछ जाती हैं सीढिया !

जब भी पिया घर लौटती हूँ बुझे -बुझे मन से
माँ के जैसी धीमे कदमो को बडी सहजता से
उतार कर मुझे ,फ़िर -फ़िर आने का न्यौता देती हैं ,सीढिया !

नदी सी स्त्री तुम
निरंतर बहती रही हों
औऱ सदा गतिशील रहना क्यूकि
ठहरना स्त्री धर्म नहीँ है

स्वंतंत्र चेतना सजग जागरूक
मगर कबीर की माया
प्रसाद की श्रद्धा
गुप्त की अबला
तुलसी कहे  ताडना की अधिकाराणि
तुम दोयम दर्जे की ही नागरिक हों

माँ हों बेटी हों पत्नी औऱ प्रेयसी भी
किंतु व्यक्ति रुप मे क्या हों
सारा व्यक्तित्व यौन शुचिता पे
आधारित भी निर्धारित भी आज

नौघा ,आकृष्टा, सिकता, निवावरी, गोपायना
सामवेद मे उल्लेख हुई स्त्रियों से पलट कर पूछो

तुम ब्रह्मविद्या मे प्रवीण गार्गी से पूछो
उपनिषद काल मे झांको तो पता चले
कि तुम आरोपित सामाजिक अवधारणा नहीँ

गणिका दासी अभिनेत्री मात्र नहीँ हों तुम
तुम हीन होकर प्रस्थापित महज अहिल्या नहीँ

कोई भी अस्वभाविक बंधन चिरस्थायी नहीँ
कयू शताब्दी से घुट रही हों फ़िर….
तुम चेतना हों चेतना…..

तो…..तुम हाँ तुम…….
अविरल बहों…निश्चिंत सी !
सुनो मै तुम्हारे साथ हूँ !

डॉ. मेनका त्रिपाठी
कनखल, हरिद्वार, उत्तराखंड!

1 thought on “डाक्‍टर मेनका की काव्‍यधारा।”

  1. सूरज प्रकाश कहते हैं:

    कितनी गहरी बातेेंं कहती हो मेनका कविता में। जैसे दर्द के मनके माला में पिरो देती हो। असीम शुभकामनाएं

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