वो मुझसे नज़रें-अशोक सपड़ा हमदर्द
वो मुझसे नज़रें चुराये तो क्या करूँ
वो आँखों से ना पिलाये तो क्या करूँ
रोज भूल जाती अक्सर मुझकों यारोँ
एक भी दिन याद न रखें तो क्या करूँ
अब दिल करता कि उसको भुला दु
पर कम्बख्त ये मुस्कराए तो क्या करूँ
रात रात भर तारें गिनता उसकी याद मेँ
पर चाँद नज़र ना आये तो मैं क्या करूँ
दर्पण भी देने लगा इस तरह से फ़रेब
आईना दर्पण ना दिखलाए तो क्या करूँ
गर हमदर्दी हो किसी को मुझसे यारों तो
नहीं कोई नहीं लेता मेरी बलाएं तो क्या करूँ
ए तारों सलामत रहना तुम जुगनु ये कहता है
रौशनी कर के की मैने खतायें तो क्या करूँ
अशोक सपड़ा हमदर्द की क़लम से दिल्ली से

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