परिचर्चा- होली का त्‍यौहार- भारत पलोड़

शीर्षक पढ़ते ही कमाल की झुरझुरी-सी छूट गई सारे बदन में । ठीक से कहा नहीं जा सकता कि ख़ुशी से या आतंक से । इस झुरझुरी ने दिमाग के सारे तार हिला दिए हैं और इसलिए जो लिखा जाएगा वो लेख हो या कविता, हम ने तो सारे रंग मिला दिए हैं । परेशानी ये है कि विषय सुझाने वाले विद्वान अथवा विदुषी ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि ससुराल दूल्हे का है या दुल्हन का । और यही विषय है उलझन का । दोनों ही जगहों पर परिवेश, परिस्थितियाँ और परेशानियाँ भिन्न होती हैं और उतना ही भिन्न होता है त्यौहार का आनन्द । दोनों ही जगह पर दोनों ही किरदार बड़े अलग तरीके से पेश आते हैं और आने भी चाहिए । ससुराल है भई! तो सोचा कि क्यों न दोनों के बारे में लिख दें! जिसे पढ़कर दूल्हा दुल्हन को चिढ़ा लेगा और दुल्हन दूल्हे की टाँग खींच लेगी । होगी ससुराल की बात, फिर भी दोनों को मज़ा देगी ।

यदि दूल्हा या जँवाई अपने ससुराल में है तो सालों से बचेगा और सालियों के संग नचेगा । कोशिश यही रहेगी कि श्रीमती जी भांग और गुंजियाँ बनाने में व्यस्त रहे और आप कुँवारियों के साथ मस्त रहे । साले यदि पिचकारी या गुब्बारे मारे, तो मुँह फुला ले । लेकिन सालियाँ रंग से भरे कड़ाह में धक्का भी दे दें, तो एक बार और धकेलने को आग्रह कर बुला ले । श्रीमती जी थोड़ा ज्यादा पुरस दे तो कहते हैं कि “मोटा हो जाऊँगा” । मगर आज कहेंगे कि “सालियों के हाथों से मिठाई खा लूँ, तो क्या छोटा हो जाऊँगा?” । हाँ, लेकिन श्रीमती जी के पुराने मित्रों के पधारने पर गहरा मानसिक संकट भी झेलना होगा । मन तो नहीं करेगा, लेकिन उनके साथ भी रंग खेलना होगा । यदि छोटे भाई को भी होली खिलाने साथ ले आए, तो इतना तय जानिये की अगले साल तक दोनों को होली मनाने के लिए एक ही गाँव में आना होगा । वहीं यदि दुल्हन या बहू अपने ससुराल में है तो ससुर जी से छुपेगी और नटखट देवर से झूठमूठ कुपेगी । होली के हुल्लड़ के बीच ही अपनी होने वाली देवरानी को पहचान लेगी । और उसे घर लाने के लिए मदद करने के वचन के बदले, पूरे साल देवर जी से गुलकन्द वाले मीठे पान लेगी । गलती से अगर पिया जी अपने दोस्तों के साथ रंग खेलने चले गए तो बहुत रूठ जाएगी और फिर कैसे, कब, कहाँ मानेगी ये तो पूनम की रात बताएगी । सासू माँ बार-बार नाश्ते की तैयारी के लिए बुला कर मस्ती में खलल डालेगी, लेकिन छुटकी ननद तो भाभी को भैया से पहले रंगने के सपने पालेगी । इसी बीच पीहर की होली की याद आएगी, तो आशीर्वाद पाने और मन बहलाने को गोरी अम्मा को फोन लगाएगी । कुछ छोटे भाई के साथ यादें ताज़ा होगी और कुछ बड़ी भाभी से जल्दी भुआ बनाने की गुज़ारिश की जाएगी । सभी से किसी न किसी बहाने चुहल हो ही जाएगी ।

पिछली होली के भांग वाले पानी-पताशे और उन्हें खाने के बाद के तमाशे कौन भूल सकता है । सास-ससुर को छुप-छुप कर होली खेलते देखने के लिए ख़ुफ़िया जगह का पता लगाने वाले को इस बार क्या इनाम दिया जाएगा ? और दीदी को रंग लगाने देने के लिए बहनोई जी से क्या ईनाम लिया जाएगा ? पड़ोस की सारी औरतें मिलकर जब नयी दुल्हन को होली खिलाती हैं, तो देखने वालों की आँहों की आवाज़ बाहर नुक्कड़ तक आती है । ससुराल के साथ बस यही परेशानी है कि होली खेल लेने के बाद थक-हार कर भी कोई सोने नहीं देता । सारी मण्डली फिर बैठ जाती है गप्पें लड़ाने और स्वांग रचने , जिसमें कोई बनता है पागल और कोई बनता है नेता ।

दोनों ही ओर के दृश्य इतने मनभावन, रोचक और सुहाने हैं कि किसी भी एक ओर जाकर दूसरे का नुकसान बहुत भारी लगता है । लेकिन ये उमंग तो उन्हीं को उपलब्ध है, जिनके पास इतने सारे रिश्तों का सुख है । वर्ना तो त्यौहार के दिन सुबह से शाम बधाईयों का दौर है और मोबाइल में मुख है । आजकल के छोटे-छोटे परिवार, होली के आसपास का रविवार खोज कर, कुछ जाने कुछ अनजाने लोगों के साथ “होली स्नेहमिलन” मना लेते हैं । मजबूर ही सही, लेकिन सभी अपने-अपने हिसाब से त्यौहार का भरपूर मज़ा लेते हैं ।

नाम: प्रतीक ‘भारत’ पलोड़ “दर्पण”

वर्तमान पता: बेलंदूर – बेंगलुरु (कर्नाटक)

मूल निवास: सोजत सिटी – पाली (राजस्थान)

Whatsapp: +91-7829003200

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