माँ मेरा स्कूल -अनीता मिश्रा'”सिद्धि”‘

“उठ बेटा जल्दी से, स्कूल जाना है”। हीरा ने भोलू को उठाते हुए कहा।तुझे तैयार कर स्कूल छोड़ दूँगी, तभी तो काम पर जाऊँगी मैं ।हीरा एक छोटे से गाँव में रहती थी,और वही के बगल वाले घर में एक,सेठ के यहाँ , बर्तन साफ करने का काम करती थी।भोलू” माँ मुझे स्कूल नहीं जाना “” क्यों क्या हुआ बेटू हीरा ने प्यार
से पूछा ।माँ मेरा स्कूल अच्छा नहीं, मुझे नीचे, बैठना पड़ता है ,सारे कपड़े गंदे हो जाते है। माँ राहुल का स्कूल कितना,सुन्दर और अच्छा है ना , बोलकर 3 क‍िवो हीरा की तरफ देखने लगा।भोलू बगल के ही उत्क्रमित विद्यालय,में पढ़ता था, जो सरकारी था ।हीरा के पास पैसे नहीं थे कि वो पास शहर के स्कूल में पढ़ा सके। राहुल सेठ का बेटा था, रोज सुन्दर कपड़े , रंग- बिरंगा बेग , सुन्दर कॉपी कलम , मोहक चित्र वाले किताब लेकर बस से जाता था। भोलू का बाल मन भी करता कि काश “”वो भी इसी तरह सज-सँवर कर””स्कूल जाता । हीरा कभी-कभी उसे लेकर सेठ के घर जाती थी। तब वो सभी चीजें राहुल भोलू को  दिखाता था। दोनों की उम्र 8से 9 साल के बीच की थी। “”मेरे पास तो कुछ नहीं है माँ, मुझे भी रंग-बिरंगी पेंसिल ला दो ना माँ””प्यार से भोलू ने कहा और सुन्दर सा लाल बैग , जिसमे किताब रखकर मैं भी पढ़ने जाऊँगा । भोलू के बाल- हठ को देख हीरा सोचने लगी, कैसे समझाऊँ उसे की तेरी माँ के पास पैसे नहीं बेटा, जो तुझे इतने महंगे स्कूल में पढ़ा सके। भोलू को प्यार से समझाते हुए, हीरा बोली, ठीक है मेरा राजा बेटा, तैयार
हो जा अगले साल तुझे सब लाकर दूँगी । और राहुल वाले स्कूल में भी नाम लिखा दूँगी।अब तो तैयार हो जा , पेंसिल भी रंग-बिरंगी  माँ , हाँ ला दूँगी ।
भोलू ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो,एक छोटा सा पकड़े का आसन ले अपने स्कूल  की ओर जाने लगा। और हीरा सेठ के घर। बाल – मन कितना भोला होता है,मैं सोच रही थी।
काश सभी बच्चों को एक सा स्कूल मिलता , तो ये भाव ना पनपते भोलू के मन में।
अनीता मिश्रा'”सिद्धि”‘
हजरीबाग झारखण्ड ।।

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