परिचर्चा -होली में ससुराल ‘राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी

होली का त्यौहार और ससुराल का जिक्र न हो। ससुराल का नाम आते ही जीजा और सारी की प्रसिद्ध होली प्रसंग याद आ ही जाते हैं। जो मजा सारी के साथ होली खेलने का है वह किसी और के साथ कभी नहीं हो सकता सालियों की संख्या जितनी अधिक होगी उतना ही आनंद जीजा-सार का इस अद्भुद खेल होली खेलने में आता है। जितना मजा उनको आता है उससे दोगुना आनंद सास-ससुर एवं उनकी सखियों को देखने में आता है। कितना ही कोशिश कर ले कितना ही भाग-भाग
के बचने की कोशिश जीजा जी करें ये सालियाँ भी उन्हें रंगें बिना नहीं छोड़ सकती जब तक मुँह लाल गुलाबी न करे दे वे चैंन से नहीं बैठती। हँसी मजाक के बीच होली खेलने का आंनद कुछ ओर ही होता है। ससुराल में जीजा वैसे तो बहुत ही आदर सम्मान पात्र होता है किन्तु होली के दिन इनके सम्मान में हँसी मजाक के बहुत कुछ हो जाता है ओर कभी-कभी तो कुछ विशेष प्रकार के जीजाजी को गधे में बैठने का सौभग्य भी मिल जाता है गले में टमाटर, भटा,गोभी की माला पहलाकर उनका सम्म्मान किया  जाता है फिर गधे पर बैठाकर भी पूरे गाँव में शोभायात्रा निकाली जाती है मजे की बात है कि उस दिन जीजाजी भी हँसतेहुए इस होली के त्यौहार का आनंद खूब जमके उठाते है। मेरे ख्याल से जिस जीजा जी ने अपने ससुराल में एक बार होली खेल ली हो उसे ‘पद्श्री’ जैसा कोई वीरता पदक तो दिया ही जाना चाहिए। बहुत बहादुरी का काम होता है ससुराल में हाली खेलना वो भी साले और सालियों के साथ।
साले भी, पूरे साल भर की कसर इस दिन निकाल लेते है। वे भी सालियों के साथ
जीजाजी को छेड़ने का कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहते है।साले एवं सालियों जितना परेशान होली खेलने में अपने जीजाजी को करती है फिर उतने ही प्यार से अपने हाथों से बने पकवान खिलाकर उन्हें प्रसन्न  भी कर देती है। जीजा भी उनके हाथों का स्वादिष्ट भोजन एवं विभिन्न प्रकार के पकवानों को खाकर उनके सब गुनाह माफ कर देता है। यही तो है होली के त्यौहार का प्रभाव तभी तो पूरे भारत में होली बहुत ही धूमधाम से मनायी जाती है। फिर ससुराल की होली तो भाग्यवानों को ही नसीब होती है। वर्ना  होली तो हर साल आकर चली भी जाती है लेकिन ससुराल में खेली गयी होली सदा ही अपनी अमिट छाप छोड़ जाती है। जिसकी याद हर बार होली आने पर आ भी जाती है भले ही इसांन कितना बूढ़ा क्यों न हो गया हो।
हम तो यही कहते है कि- होली ऐसी खेलिये, जिसमें सब रंग जाये। तन भींगी न वस्त्र, मन केवल रंग जाये।।
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/ राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’
संपादक ‘आकांक्षा’ पत्रिका
अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
महामंत्री-अ.भा.बुन्देलखण्ड साहित्य एवं संस्कृति परिषद
शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
पिनः472001 मोबाइल-9893520965

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