होली में ससुराल-मधु शंखधर

अभी -अभी तो ब्याह हुआ है,
नूतन नवल किशोरी से।
बचपन की तन्द्रा टूटी थी,
नटखट गाँव की गोरी से।
खुशियाँ ही खुशियाँ छाईं थीं,
पत्नी का सुख पाने से।
ऋतु बसंती भी छाई थी,
हरियाली के आने से।
फागुन मास लगा कुछ ऐसे,
होलिका की तैयारी से।
तभी बुलाया आया घर पर,
अपनी ही ससुरारी से।
चला मगन हो हर्ष भाव ले,
पहुँचा अपनी ही गाड़ीसे।
सास ससुर सरहज को देखा,
नयन मिले तब साली से।
रात्रि होलिका संग जलाई,
रोग दोष सब बारी से।
प्रातःकाल की बेला में ही,
सब भिगो दिए पिचकारी से।
उठा तभी ज्यूँ कपड़े बदले,
पहुँचा साला तैयारी से।
उठा लिया गोदी में हमको,
जा पटका बदहाली से।
साँस लिया तब हमने जाना,
सने थे गोबर माटी से।
बाहर आ स्नान किया जब,
सोचा हो गया ये कैसे?
तभी कहीं से शाली आकर,
भिगो गई हमको रंग से।
अब तो बिल्कुल बुरे फँसे थे,
आन फँसे होशियारी में।
तब तक प्यारी सरहज आई,
दुबका मैं ओसियारि में।
प्यार से उसने मुझे बुलाया,
नजर पड़ी तब थाली पे।
सासु सरहज थाल लिए थी,
भर पकवान मिठाई से।
गुझिया ,पापड़,खुरमा,मठरी,
छोला पूड़ी कचौड़ी से।
प्रेम- प्रेम से सबने खिलाया,
सासू सरहज शाली ने।
पत्नी ने हँस कर फरमाया,
कैसा हाल है होली में।
मैं भी मुसकाया और बोला,
मजा आ गया होली में।
साली ,सरहज, साले सबका,
रंग छा गया होली में।
जो डर था सब फुर्र हुआ सब,
रंगा प्रेम पिचकारी से।
सब का प्रेम समर्पित पाया,
होली की त्यौहारी में।
आएगी जब भी यह होली,
आऊँगा ससुरारी में।
होली महत्वपूर्ण हो तब ही,
जब हो सब ससुरारी में।।
मधु शंखधर
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
पता- 70/53/S – 204 सूर्या विहार अपार्टमेंट ,बलरामपुर हाउस, इलाहाबाद।
9305405607

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