सिसक रहे आज होली के रंग-आशा जाकड़

सिसक रहे हैं आज होली के रंग।
महंगाई ने कर दिया रंग – बदरंग ।।

लाल रंग अब लहू बनके बह रहा,
पीला रंग कायर बन मुंह छुपा रहा ।
हरी- भरी धरती अब कहाँ रह गई ,
ऊंची ऊंची इमारते आकाश छू रही ।
रह गया केवल अब होली का हुड़दंग,
महंगाई ने कर दिया रंग -बदरंग ।।

बच्चों की पिचकारियां औंधे मुंह पडीं ,
बिन पानी -रंग खाली टंकी शुष्क पड़ी ।
महंगाई की मार रंग फुहार फीकी पड़ी ।
फागुनी बयार मद्धिम शांत चल पड़ी
बिन पानी होली कैसे राधा मोहन संग ?
मंहगाई ने कर दिया रंग – बदरंग

पावन पर्व अस्त -व्यस्त हो रहे
पर्वों की गरिमा क्षत-विक्षत रो रहे
वनों मे टेसू के फूल मुरझा रहे
खाद्य पदार्थों के भाव आसमाँ छू रहे।
मथुरा भी गाए बिन होली सूने अंग
महंगाई ने कर दिया रंग– बदरंग।।

सिसक रहे हैं आज होली के रंग ।
महंगाई ने कर दिया रंग- बदरंग।।
आशा जाकड़
9754969496

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