आ जा पी ले भंग भायला- विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’
आ जा पी ले भंग भायला
होड़ी  खैल्यां संग भायला
एक के दो दो दीखे मोकूं
कैसी  दे  दई  भंग भायला
तन मन दोनूं रंग जावेला
मत कर मोकूं तंग भायला
अनूठो  देवर-भाभी  रिश्तो
घर-घर मच रही जंग भायला
क्यूँ मुँह कूँ लटका बैठ्यो रे
हम  हैं  तेरे  संग  भायला
ढ़ोल पर तू थाप दिए चल
‘व्यग्र’ बजाये चंग भायला
(2)
गौरी जोहवे वाट
फागुन को ठाट
हाट रंग-पिचकारी को
छुप गयो जाने कहाँ
देखें हम यहाँ
दो महतारी को
डारूँ उनपे रंग
करूं मैं तंग
और वो झुँझलाये
मन में मेरे बात
 पिचकारी साथ
 शायद ही बचपाये
 गालन मलै गुलाल
 बिगाड़ें हाल
आज दिन होरी को
 करें हमें परेशान
बॉप बलवान
बदला लें चोरी को
एक लगाये बात
 करे एक घात
 ब्रज की गौरी रे
 भोरे मेरे श्याम
ललित ललाम
खेलें सब होरी रे...
( 3)
मदमाती होली रे…
होली में हुड़दंग
बजेगी चंग
रंग की बौछारें
भावज के देवर
लावें घेवर
लगे प्यारे-प्यारें
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डारे सबही रंग
चढ़ाँएं भंग
मदमाती होली रे
नारी हुई निडर
चलायें मुद्गर
नैनों से गोली रे
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निखरा निखरा रूप
  सुबह की धूप
मेरे मन को भाये
  नाचे मन मोर
फागुन का जोर
सजन घर पर आये
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फागुन की रात
निराली बात
चाँदनी छिटकायें
गावें गौरी गीत
पुरानी रीति
सजन से इठलायें
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विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’
कर्मचारी कालोनी,गंगापुर सिटी,
स.मा. (राज.)322201
मोबा : 9549165579
ई-मेल :-

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