जीवन का सफर-मुस्कान चाँदनी

जीवन के सफर में
कितने अकेले है हम
भीड़ तो लगी है चारो तरफ
पर मायूस खड़े हैं हम
तन्हाईयों में लिपटी हुई,
है मेरी राते
खामोश लवो से
निकल रही है आहें
कितने मजबूर हो गये है हम
जीवन के इस सफर में
कोई रास्ता नहीं
कोई मंजिल नहीं
न मकसद रहा
जीने की जिंदगी में
बेवजह जीये जा रहे हैं हम
जीवन के सफर में
टूट रही है साँसे
छूट रहे हैं अपने
धुँधली सी होने लगी है नजर
मिटने लगे है आँखों से
तस्वीर सबकी
बदल रही है रेखायें
मेरे हाथो की
मूँह मोड़ कर बैठा है
तकदीर मुझ से
परेशानियो के सागर में
डुबकी लगा रही है
मेरी बेचैन आत्मा
मेरे इस जीवन के सफर में ।

मुस्कान चाँदनी, बिहारशरीफ, नालंदा

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