परिचर्चा: कितने जिम्मेदार हैं हम…..विजयानंद विजय
हम लाख कहें खुद को ज्ञानी

हम दंभ भरें मानवता का।
हैं काट रहे उस डाली को
जिस पर बैठे हैं आज सभी।
इस पर्यावरण को अगर किसी ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है, तो वह है मनुष्य।हम खुद को चाहे लाख सबसे विकसित,शिक्षित,ज्ञानी, सभ्य व सुसंस्कृत जीव समझें और मानें, मगर सही अर्थों में हम प्रकृतिहंता ही नहीं, आत्महंता हैं….पूर्णत: विवेकहीन, असंवेदनशील, गैर जिम्मेदार, लापरवाह व स्वार्थी जीव, जो सिर्फ तात्कालिक सुविधा व लाभ की बात ही सोचता है। जिसके वज़ूद से उसके खुद का वज़ूद भी जुड़ा है, वह उस प्रकृति, सृष्टि और पर्यावरण के बारे में तनिक भी नहीं सोचता।हमारी इसी प्रवृत्ति ने पर्यावरण का आज ये हाल बना रखा है कि इसी तरह और इसी रफ्तार से सबकुछ चलता रहा, तो आने वाले पचासेक सालों में यह पृथ्वी हमारे रहने,जीने, साँस लेने लायक रह भी पाएगी, इसमें संदेह है।
जिस बुरी तरह से हम प्लास्टिक और प्लास्टिक से बनी चीजों पर निर्भर हो चुके हैं, वह आगे चलकर हमारे लिए बहुत हानिकारक होने वाला है।घरों, दुकानों,व्यापारिक प्रतिष्ठानों, कल-कारखानों से निकलने वाला  धुआँ, कचरा और विविध प्रकार के विषैले रासायनिक अवशिष्ट जिस तरह हमारी आबोहवा, जल और मिट्टी में घुल रहे हैं, वे न सिर्फ जलीय स्रोतों को ही प्रदूषित कर रहे हैं,बल्कि मिट्टी की उर्वरा क्षमता का क्षय कर हमारी प्राणवायु को भी विषाक्त व दमघोंटू  बना रहे हैं।
औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और आधुनिकीकरण समय की माँग जरूर है, मगर व्यावसायीकरण के इस दौर में यह इतने बेतरतीब और अनियोजित ढंग से हो रहा है कि न तो पर्यावरण के मानकों पर ध्यान दिया जा रहा है, न ही एतद् संबंधी दिशानिर्देशों का अनुपालन किया जा रहा है।बड़े-बड़े पुल, मकान व सड़कें बनायी जा रही हैं और पेड़-जंगल-बाग-बगीचों का वज़ूद मिटाया जा रहा है।विकास और समृद्धि की स्वार्थ पूर्ण इंद्रधनुषी चाहत में विशाल हरे-भरे, लहलहाते जंगल काटे जा रहे हैं और उनकी जगह कंक्रीट के गगनचुंबी जंगल बेतहासा उगाए जा रहे हैं। यही है हमारी नूतन विकासवादी संचेतना व अवधारणा, जिससे आसन्न समय में प्रकृति का कोपभाजन बनने से हमें कोई बचा नहीं पाएगा।भयंकर गरमी होगी,कड़ाके की ठंड पड़ेगी, सुनामी आएगी,ज़लज़ला उठेगा,बाढ़, सुखाड़, आँधी-तूफान आएँगे और आएगा प्रलयंकारी भूकंप भी।शेष बचेगा सिर्फ और सिर्फ विनाश का खौफनाक  मंजर।ओजोन  परत का  क्षय , ग्रीन हाउस प्रभाव व ग्लोबल वार्मिंग आज ज्वलंत पर्यावरणीय संकट बन हमारे सम्मुख खड़े ही हैं , जिससे पूरा विश्व चिंतित व भयभीत है।प्रदूषण के मामले में हम अब हानि के उच्चतम स्तर तक पहुँच चुके हैं।विश्व के बड़े-बड़े मंचों से पर्यावरण संरक्षण हेतु विविध प्रकार के प्रस्ताव पारित किए जाते हैं,मानक तय किए जाते हैं, दिशानिर्देश दिए जाते हैं,रेड एलर्ट तक जारी किए जा चुके हैं।मगर हम सचेत हों तब न ? हम तो वो कालिदास हैं, जो अपनी ही डाली को काटने पर तुले हुए हैं।
जरूरत आज इस बात की है कि हम पर्यावरण के जैव व अजैव घटकों के अस्तित्व व संरक्षण की अनिवार्यता को समझें।शिक्षा,संचार,प्रचार व तकनीक के सभी माध्यमों से समाज के हर वर्ग और तबके तक हम सभी यह संदेश निश्चित रूप से पहुँचाने का समेकित, सामूहिक और समुचित प्रयास करने का एक अभियान चलाकर सबको जागरूक और सचेत करें और समाज को बताएँ कि हमारे होने के लिए इन पेड़ों,नदियों,झीलों,झरनों,पहाड़ों,वन्य जीवों और इस आबोहवा का होना कितना जरूरी है।हम हैं,तभी इनका अस्तित्व है।और, ये हैं, तभी हमारा अस्तित्व है।
– विजयानंद विजय
पता –
” आनंद निकेत ”
बाजार समिति रोड
पो. – गजाधरगंज
बक्सर ( बिहार ) – 802103
ईमेल – vijayanandsingh62@gmail. com
संपर्क – 9934267166

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