परिचर्चा: कितने जिम्मेदार हैं हम…..डा०भारती वर्मा बौड़ाई
       प्रकृति से निरंतर लेते रहने की मनुष्य की प्रवृत्ति के कारण आज कई विषय चिंतनीय ही नहीं बल्कि चिंता का कारण बन गए है। पर्यावरण को बचाना एक अहम मुद्दा है हम सबके सामने। सरकार क़ानून और नीतियाँ बना कर अपना काम कर रहीं हैं, पर उस पर सबसे ज़्यादा अमल आम जनता को जागरूक होकर करना है क्योंकि इसके लिए हम सब ही सबसे ज़्यादाज़िम्मेदार हैं। क्या-क्या हो रहा है यदि इसकी ओर हम दृष्टि घुमायें तो कई बातें नज़र आती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों की गुणवत्ता में गिरावट आने का अनुमान है। वन अनुसंधान संस्थान के जलवायु परिवर्तन विभाग के शोध में यह पाया गया है कि वनस्पति की केमिस्ट्री के साथ उनके जीन में भी बदलाव आ रहा है और वनस्पतियों में यह बदलाव भविष्य में ख़ुद को बचाये रखने के लिए आ रहा है।
 उत्तराखंड में हर साल जंगलों में लगने वाली आग के कारण बड़े पैमाने पर वन संपदा तबाह होती है। इस आग के कारण कुछ मानव जनित हैं और कुछ प्राकृतिक। अवैध कारण छिपाने के लिए जंगलों में आग लगा दी जाती है, जंगलों से गुज़रते हुए लापरवाही से जलती बीड़ी-सिगरेट लोग फेंक देते हैं, आकाशीय बिजली गिरने से आग लग जाती है
जानकारों के अनुसार २०५० तक भारतीय आबादी १.७ अरब होने की संभावना है तो निश्चित ही अनाज की माँग बढ़ेगी। जलवायु परिवर्तन के कारण अनाज के पोषक तत्वों में भी कमी आ रही है। मनुष्य द्वारा निर्मित और मौसमी कारणों से जीव-जंतुओं की कई प्रजातियाँ आज  समाप्त होने के कगार पर आ गई हैं, प्राकृतिक संसाधनों का आवश्यकता से अधिक दोहन भी पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है।
        आज जैसी जीवन शैली के लोग आदी बन गए हैं उसमें इंसान प्रकृति से दूर होता चला गया है। आज हम जब घूमने के लिए पहाड़ों पर जाते हैं तो वहाँ कितनी गंदगी फैला कर आते हैं। घूमने योग्य स्थानों की नैसर्गिकता को भी हमने नष्ट कर डाला है। पहले देहरादून में सहस्रधारा, गुच्चूपानी, टपकेश्वर, मसूरी आदि का सौंदर्य देखते ही बनता था, वहाँ ख़ूब ठंडक होती थी, पर अब पंखों की ज़रूरत अनुभव होती है। पर्यटकों की आवाजाही से फैली गंदगी ने सब बदल कर रख दिया है। पुराने लोगों से बात करने पर पता चलता है कि बदले हुए रूप के कारण वे घूमने के बजाय घर में रहना ज़्यादा पसंद करने लगे हैं। केदारनाथ में आई आपदा भी प्रकृति जनित कम, मानव जनित लापरवाही का ही परिणाम था, पर मनुष्य ने अभी भी ऐसी आपदाओं से कुछ सीखा नहीं।
       जीवनदायिनी नदियाँ नालों में परिवर्तित होकर कूड़े-कचरे से भरी पड़ी हैं और नाले सड़कों के चौड़ीकरण के करंपर से बंद होकर नीचे बहने को विवश हैं और ये प्रदूषित पानी कितनी असाध्य व्याधियों को जन्म दे रहा है कहने-बताने की आवश्यकता नहीं है।
          मनुष्य इतना लालची और स्वार्थी हो गया है कि अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए  प्रकृति का दिन-रात दोहन करने में लीन है। वह यह समझना ही नहीं चाहता कि उसके इस कृत्य से कितना नुक़सान हो रहा है। जंगलों के कटने, मकानों-बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों के निर्माण होते जाने से जीव-जंतु भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं। अब तो वे भी शहरों में पैर रखने लगे हैं।
           आज आवश्यकता इस बात की है कि अपने कल को बचाने के लिए हम आज ही आवश्यक क़दम उठायें। इन सब समस्याओं का सामना करने के लिए हर व्यक्ति को संकल्पवान होकर ईमानदारी से क़दम उठा कर उन्हें करने में जुटना होगा, नहीं तो प्रकृति के प्रकोप से हमें ईश्वर भी नहीं बचा सकेगा।
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डा०भारती वर्मा बौड़ाई
देहरादून, उत्तराखंड

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