परिचर्चा: कितने जिम्मेदार हैं हम…..दीपासंजय*दीप*
प्रदूषण नाम का धीमा जहर  हवा, पानी, धूल आदि के माध्यम से मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर उसे रुग्ण बना देता है।पर्यावरण संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से हमने पारिस्थितिक संतुलन को काफ़ी हद तक बिगाड़ दिया है। यह हमारे लिए जरूरी है कि हम इसके साथ प्रयोग करने और इसे अधिक शोषण करने के बजाय पर्यावरण के अनुरूप रहें। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे कार्यों और गतिविधियों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर प्रभाव पड़ता है। वास्तव में पर्यावरण हमारे जीवन संतुलन को बनाए रखता है। हमारे जीवन की गुणवत्ता अनिवार्य रूप से हमारे परिवेश पर निर्भर करती है।   प्रकृति का प्रत्येक कार्य व्यवस्थित एवं स्वाचालित है। उसमें कहीं भी कोई दोष नहीं है। जीव के शरीर की रचना उसकी अपनी विशेषताओं तथा पर्यावरण के ​अनुसार इतनी सटीक है कि कोई भी कमी निकाल पाना सम्भव नहीं है। भौतिक पदार्थों का चक्र सन्तुलित है। कहीं भी किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आता। मानव प्रकृति का एक अंग है। लेकिन अपनी अविवेकी बुद्धि के कारण मानव अपने आपको प्रकृति का अधिष्ठाता मानने की भूल करने लगा है। मानव द्वारा की गई ये भूलें प्रकृति के कार्य में व्यवधान डालती हैं ओर ये व्यवधान जीव जगत् को हानि पहुंचाते हैं।
  भू खनन, जनसंख्या बाहुल्य,युद्ध, भोगवाद की संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग,  परमाणु परीक्षण, औद्योगिक विकास आदि के कारण नई-नई समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इन समस्याओं को उत्पन्न न होने देना मानव जाति का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।  धरती का पानी 70 प्रतिशत प्रदूषित हो चुका है। उन्नत कृषि के नाम पर इस्तेमाल रासायनिक खादों, कीटनाशकों, उद्योगों के विसर्जन और अवैज्ञानिक धार्मिक कर्मकाण्ड जल को भयंकर रूप से प्रदूषित कर रहे हैं। जल के लिए लोक चेतना का पूर्ण अभाव है।  ग्लोबलाइजेशन की वजह से बाजारु सभ्यता तेजी से पाँव पसार रहीं है जिसकी वजह है प्लास्टिक का जहाँ उपयोग बढ़ रहा है , वहीँ वाहनों की तादात भी वायु प्रदूषण में अहम भूमिका निभा रहीं है । पंजाब और हरियाणा के किसानों पर दोष मढऩा अन्याय है , इसके लिए खुद दिल्ली और वहाँ की सरकारें जिम्मेदार हैं । फसलों के जलाने से पैदा होने वाले धुएँ से इसका कोई सम्बन्ध नहीँ हैं । वक्त रहते अगर हम विकास और विलासिता की अंधी दौड़ के पीछे भागते रहे तो पूरे देश की स्थिति भयावह हो जाएगी।  आज सामाजिक जागरूकता की नितान्त आवश्यकता है। पर्यावरण संरक्षण जनजागृति के बिना अपूर्ण होगा, सरकार तथा अंतरराष्ट्रीय संगठन चाहे कितना भी प्रयास करें। वास्तव में पर्यावरण को तब ही स्वस्थ बनाया जा सकता है जब हम पर्यावरण को उतना ही महत्व दें  जितना हम अपने परिवार को देते हैं।
✍🏻नाम-दीपासंजय*दीप*

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