परिचर्चा: कितने जिम्मेदार हैं हम…..रेखा दुबे

‘आधुनिकता की ओर अमोघ गति से दौड़ता भारत कब आ गया पर्यावरण प्रदूषण की चपेट में पता ही नहीं चला”,कई लोगों के मन में प्रशन उठता है आखिर यह पर्यावरण प्रदूषण क्या है,क्यों होता है और आधुनिकता से या अज्ञानता से इसका क्या संबन्ध है तो आइए हम जानें पर्यावरण प्रदूषण क्या है?।
हमारी प्राकृतिक संपदा जंगल,
पहाड़,नदियाँ, हवा ,पानी,समुद्र आदि जो हमें प्रकृति से प्राप्त है ,वही पर्यावरण है और हमारे चारों ओर का यही वातावरण मनुष्य व अन्य सभी जीवधारियों के स्वास्थ्य ओर उनकी जीवन शैली पर अनुकूल व प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
अतः हम कह सकते हैं की वातावरण हमारी शारिरिक,सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक, व्यवहारिक,स्थितियों को परिस्थितियों के हिसाब से सुगठित करता है।
पर्यावरण प्रदूषण क्या है व क्यों होता है?
पर्यावरण प्रदूषण के लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार है,
मुख्यतः पर्यावरण प्रदूषण निम्न प्रकार का ओर निम्न प्रकार से होता है।
जल प्रदूषण
वायु प्रदूषण
ध्वनि प्रदूषण
भूमि प्रदूषण आदि
अगर हम देखें तो भारत ही क्या पूरा विश्व इस प्रदूषण की चपेट में है,
अगर हम वास्तविकता देखें तो पायेंगे कि हम लोग अज्ञानता बस
अपने आसपास प्रदूषण फैलाते है पर समझ नहीं पाते कि हमारी यह अज्ञानता नेचर(प्रकृति)को कितना प्रदूषित कर रही है
वायु के प्रदूषित होने का मुख्य कारण हमारे यहां जंगलों के तेजी से काटे जाना ,पेड़ो की कमी होने से वायुमंडल में ऑक्सीजन की कमी आई है।
इसी के साथ वायु को प्रदूषित करने वाले तत्व जैसे कारखानों से निकलने वाला धुआँ,
पेट्रोल,डीजल से चलने वाले वाहनों,धूल,मिट्टी के कणों कणों आदि से होता है ,हवा में मिले यह रसायनिक तत्व सांस के द्वारा हमारे शरीर मे प्रवेश कर हमें भयंकर बीमारियों का शिकार बनाते हैं,व अन्य जीवधारियों को भी नुकसान पहुंचाते हैं ,इसी कारण की कई जीव-जन्तु पशु-पक्षियों का लगभग लोप हो गया है।
जल प्रदूषण-बाहर के अपशिष्ट पदार्थों के जाने के कारण जब जल दूषित होने लगता है और उससे बीमारियां बढ़ने लगतीं हैं तो यह प्रदूषण जीवन मात्र के लिए संकट का कारण बन भारी प्राकृतिक प्रकोप बन जाता है
जिसके लिए भी हम स्वयं ही उत्तरदायी होते हैं।
कल कारखानों का कचरा और उससे निकलने वाला केमिकल हम नदियों, नालों ,तालाव,झीलों आदि में वहा देते है जो प्रदूषण का बड़ा कारण है साथ हिमानव मल का नदियों या पानी वाले स्थानों के पास विसर्जन होना,वहीं जानवरों को नहलाना,कपड़े धोना अथवा नदियों में शवों को प्रवाहित करने आदि से भी जल प्रदूषित होता है।
इससे मनुष्य पशु या पक्षियों के स्वास्थ पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
इससे टायफायड, पीलिया,हैजा जैसी महामारियां भी गांव के गांव नष्ट कर देतीं हैं।
खेती में डाली गई कीटनाशक दवाएं भी भूमि के अंदर के पानी को दूषित करतीं हैं।
अब हम आते है ध्वनि प्रदूषण पर
जरूरी नहीं जो आवाज हमको सुख दे रही है वह दूसरे के लिए भी सुखकर हो लाउडस्पीकर पर गाने या भजन चलाना किसी बीमार व्यक्ति,दुखी व्यक्ति या पढ़ने वाले बच्चे के लिए बहुत कष्टप्रद हो सकता है किसी की शान्ति भंग करने का हमें कोई अधिकार नहीं है ,दूसरा मोटर व्हीकल का शोर हॉर्न की उच्च तीव्रता वाली आवाजें हमारी मानसिक शान्ति भंग करतीं है।
जो कि हमारे ही द्वारा किया जाता है,जरा सी समझदारी से हम इस ध्वनि प्रदूषण से बच सकते हैं
भजन गाने सुने मध्यम आवाज में
गाड़ियों के हॉर्न कम आवाज के हों और उन्हें वेबजह ना बजाएं
अब हम आते हैं भूमि प्रदूषण पर
आजकल जैविक खेती बंद हो गई है सभी अपनी फसलों पर दवाओं का छिड़काव करवाते है जिस कारण भूमि की उर्बरा शक्ति कम हो रही है साथ ही केमिकल युक्त मिट्टी में जब फसल कटने के बाद आग लगाई जाती है तो उसका धुआँ वातावरण को विषाक्त करता है एक आध साल जमीन पड़ती भी छोड़नी चाहिए जिससे उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ जाये ।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए काफी हद तक हम खुद ही जिम्मेदार है तेजी से कटते जंगल ,टूटते पहाडों पर खड़ी होती गगनचुंबी इमारतें,हमारी आधुनिक जीवन शैली के साथ धुआँ उड़ाती भागतीं गाड़ियां,
केमिकल से पकाये ओर उगाए गए फल व सब्जियां,
बिखरी पन्नियों और ठोस कचरे से पटी धरती,
नदियों की तंग धार में तैरती गन्दगी
गायब होते पोखर,तालाब,पगपग
पर खोदे गए ट्यूबवेल की वजह से गिरता जमीन का जल स्तर,
गायब होते वन्य जीव-जंतु
चहकना भूले,गायब होते पक्षी
खेत ,बाग,बगीचे कहाँ है अब
ऐसे में मौसम के बदलते मिजाज के लिए हम सब कहाँ तक जिम्मेदार नहीं हैं ?…
******रेखा दुबे

Leave a Reply

%d bloggers like this: