परिचर्चा: कितने जिम्मेदार हैं हम…..चन्द्रकांता सिवाल चन्द्रेश

मानव जीवन में अगर देखा जाय तो पर्यावरण का विशेष महत्व है, पर्यावरण से हमारा तात्प्रय वह स्थान जहाँ हम रहते हैं जिस वायु में हम सांस लेते हैं, हमारे आस पास का वह परिवेश जो हमारे जीवन को बहुआयामी बनाता है। उक्त सभी बातें निर्भर करती हैं कि हमने उस स्थान जगह की स्वच्छता की ओर कितना ध्यान दिया है व सतर्क हैं।
पर्यावरण को यदि दूसरे रूप में देखा जाए तो इसका सीधा संबन्ध प्रकृति से है, प्रकृति एवं पर्यावरण ये दोनों ही एक दूसरे के पूरक पर्याय हैं। प्रकृति जो की पर्यावरण की अमूल्य निधि है। प्रत्येक जीव जन को पोषण देने वाली जीवन दायनी प्रकति। जिस प्रकार भोजन जीवन की अनिवार्य रूप से प्राथमिक आवश्यकता है। भोजन हमारे शरीर को शक्ति एवं पुष्टि प्रदान करने वाला है, अतः उसमें प्रोटीन शर्करा वसा खनिज विटामिंस आदि का उचित अनुपात पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए।ताकि शरीर में अच्छे कोषाणुओं का निरन्तर सृजन होता रहे। उसी प्रकार स्वच्छ वातावरण एक स्वस्थ समाज की नींव है। स्वस्थ जीवन जीने के लिए प्रकति एवं पर्यावरण की अग्रणी भूमिका है।
परन्तु वर्तमान में पर्यावरण मानव जीवन में चिंता का विषय बनता जा रहा है। शुद्ध वातावरण उस स्थान पर उपलब्ध वायु सांस लेने की क्षमता प्रकृति द्वारा उस क्षेत्र में उत्सर्जन की क्षमता होती है। सभी मानव जीव जंतु उसी में सांस लेते हैं, प्रकृति के नियम और कानून प्रत्येक जीव जन के लिए समान हैं।
परन्तु पिछले कई दशकों से निरंतर प्रकति के दोहन से इसका सीधा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ा है, पर्यावरण प्रदूषण विकसित एवं विकासशील दोनों ही प्रकार के राष्ट्रों में विकट समस्या का रूप लेता जा रहा है। विदेशों में इसलिए कि वहां पर पर्यावरण से ज्यादा छेड़छाड़ एटम बमों का परीक्षण पर्यावरण प्रदूषण का प्रमुख कारण है।
विकाशील देशों अंधाधुंध जंगलों की कटाई कंकरीट की मीनारों में बदलना इसका मुख्य कारण है।देखा जाय तो दोनों ही सूरत में स्वस्थ वातावरण का न मिल पाना इसका सबसे बड़ा उदारण हमारा देश ही है।जिसमें गत वर्षों से प्रदूषण का पैमाना निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। प्रदूषण वास्तव में प्रकृति से छेड़छाड़ का सीधा परिणाम है।

पर्यावरण प्रदूषण के निम्न कारण हैं

भूमि प्रदूषण: जमीन में अनेक प्रकार के एटम बमों का परीक्षण प्रकृति में समय पर बारिश न होना जंगलों की कटाई रसायनिक खादों के छिड़काव के कारण भूमि प्रदूषण बढ़ रहा है। जिससे खाद्द पदार्थो की पोष्टिकता नष्ट हो रही है। जिसके दुष्परिणाम स्वरूप मनुष्य की जीवन शक्ति कम होती जा रही है। वायु प्रदूषण: वायु प्रदूषण के बढ़ने से मनुष्य को शुध्द वायु आक्सीजन के न मिलने से श्वाश संबन्धी रोग बढ़ रहे हैं।
रक्त की कमी विकृति का परिणाम जीवन शक्ति की कमी होना।जल प्रदूषण: जल प्रदूषण पेट की बीमारियों का मूल कारण है, गंगा, यमुना जैसी बड़ी नदियों में कारखानों का मलबा बड़े महानगरों की गंदगी मूर्तियों का जल विसर्जन करना अंधविश्वास के कारण मानव शव को जल में प्रवाहित करने से जल का प्रदूषित होना जिससे मनुष्यों में कोलाइटिस हेपेटाइटिस, हैजा, टाइफाइड, पीलिया जैसे खतरनाक रोग बढ़ रहे हैं। एवं जीवन शक्ति का उत्तरोत्तर ह्रास हो रहा है।ध्वनि प्रदूषण: गणेश उत्सव दुर्गा पूजा देवी जागरणों के अवसरों पर तीव्र आवाज लाउड स्पीकर प्रयोग, गाड़ियों के हॉर्न कल कारखानों में मशीनों की आवाज कान की विकृति एवं मस्तिष्क रोगों को बढाने में सहायक होती है। भूमि, वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण से पर्यावरण एवं मानव जीवन दोनों का ही हनन हो रहा है।
वर्तमान में हमें प्रकृति एवं पर्यावरण के सरंक्षण हेतु उचित प्रयास की आवश्यकता है। हमें मिट्टी, जल, वायु एवं ध्वनि को प्रदूषित होने से बचाना होगा, घरों के आस पास गन्दगी कूड़ा- करकट कचरा आदि जमा नहीं होना चाहिए तथा घरों से दूर गड्ढे में गाड़ देना चाहिए। खुले में मलमूत्र विसर्जन नहीं करना चाहिए, ग्रामीण क्षेत्रों में सुलभ शौचालय भारत सरकार की योजना का अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर प्रोत्साहन देना चाहिए। पेड़ो की अनावश्यक कटाई न कि जाए तथा अनवरत वृक्षारोपण किया जाये। जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया जाये।
प्रत्येक नागरिक को घरों में अग्नि होम या यज्ञ किया करें, ताकि वातावरण शुद्ध व पवित्र रहे। गाड़ी कल कारखानों में धुंआ निकलने पर अंकुश लगाना चाहिए। और इस तरह बढ़ते हुए प्रदूषण को नियंत्रित कर जीवन शक्ति के ह्रास को बचाया जा सकता है। अतः पर्यावरण के प्रति क्रांति लाना समाज का दायित्व भी है व कर्त्तव्य भी
ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ जीवन दिया जा सके। पर्यावरण के प्रति चेतना जगाना समाज व सरकारों का दायित्व बनता है, अन्य सभी स्वास्थ्य संबन्धी कार्यक्रमों में पर्यावरण को सर्वप्रथम रखा जाय। वर्तमान में यह संदेश घर घर में चाहे टी वी के माध्यम चाहे संवाद सहयोगी संस्थाओं के द्वारा जागरूकता लाने की अतिआवश्यकता है।

लेखिका चन्द्रकांता सिवाल चन्द्रेश
करौल बाग़ (नयी दिल्ली)

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