लघुकथा “विचारों का दैत्य”-: रेखा दुबे

सुलभा जैसे ही ड्राइंग रूम में चाय लेकर पहुँची,भागवत कथा वाचक रामनारायण शास्री जी पति के साथ बैठे हुए उत्साह से अपनी बात कहने में व्यस्त थे,बिषय था गिरधर शास्त्री के बेटे का विवाह जो बहुत ही पेचीदा स्थितियों में टूट गया था।
लडक़ी वालो को कहीं से पता चला था लड़का पहले ही किसी से शादी कर चुका है.वह लडक़ी पांच साल से उसके साथ रह रही है जो सिड्यूल कास्ट की है शास्त्री जी छुपकर शादी करने जा रहे थे पर उस लड़की ने,लड़की वालों के सामने जाकर लड़के का सब कच्चा -चिट्ठा खोल दिया था इस लिए लड़की वालों ने शादी के एक दिन पहले ही शादी करने से मना कर दिया इस कारण शास्त्री जी की इज्जत पर बन आई ,बात करते करते रामनारायण शास्त्री बहुत जोर से हँसे,हँसते हुए बोले अरे गिरधर एक बार मेरे पास तो आता में सब ठीक कर देता।वो कैसे सुलभा ने हैरत से आंखें फैलाते हुए कहा?.शास्त्री जी बेहद अहंकार भरे स्वर में बोले तुम कुछ नहीं समझ पाओगी इस संबध मैं ।फिर भी वह बेचैन होकर बोली!
कैसे…उन्होंने अपनी गर्दन हिलाते हुए दार्शनिक अंदाज में कहा ऐसे मामले हमने औऱ भी सुल्टाये(निबटाये)हैं आज बड़े मजे में हैं बे सब ऐसा करे , उस नीच जात की लड़की के पास जाते हाथ पैर जोड़ते दो-पाँच लाख रुपैय्या देते और समझाय के कह देते आदमी तो तेरा ही रहेगा ,हमारी नाक बचा ले शादी हो जान दे शादी में भी तू आना, जिससे तेरे घर आने जाने का रास्ता खुल जायेगा,शादी के बाद पडी रहेगी वो लड़की घर के कोना में आदमी ते पास आया करेगा.. कैसी रही कह कर वह
एक दैत्य की तरह जोर-जोर से हिलहिल कर हँसने लगे ,और सुलभा अंदर तक कांपने लगी थी। देख कर रामायण,भागवत पर बैठे इस स्वरूप को और उसके पति क्रोधातुर होते हुए कह रहे थे पण्डित जी आप यह क्या कह रहे हैं इतने ज्ञानी होते हुए भी इतनी गिरी हुई बात दो जिंदगियो को बर्बाद करना कहाँ तक जायज है?
पण्डितजी का हँसना यकायक रुक गया।
रेखा दुबे

Leave a Reply

%d bloggers like this: