गणतन्‍त्र दिवस पर लता के दो पुष्‍प।

नैतिकता का अवमूल्यन
नैतिकता का अवमूल्यन है निकला इसका अर्क है।
है स्वतंत्र पर भारत माँ का जैसे बेड़ा गर्क है । ।

बेच दिया है नैतिकता को कपटी कुटिल लुटेरों ने,
कैद हो गई है मानवता ज्यों इस्पाती ढेरों में,
जोंक बने ये चिपकें -चूंसें खून देश के लोगों का,
आँसू बहा रही है माता कंकालों के ढेरों में ,

नैतिक और अनैतिक में अब रहा न कोई फर्क है ।
है स्वतंत्र पर भारत माँ का जैसे बेड़ा गर्क है ।।1।।

हर चुनाव में दल बदलू और बाहुबली गुर्राते हैं,
युवकों को झांसा दे कर ये अपना जाल बिछाते हैं,
नयी-नयी चालें रचते ये करते माल तिजोरी में,
राजनीति का पहन मुखौटा ये नेता बन जाते हैं ।

करें बहाना देश भक्ति का देते कैसा तर्क है ।
है स्वतंत्र पर भारत माँ का जैसे बेड़ा गर्क है ।।2।।

गाँवों से कर रहे पलायन कल तक जो थे मंगल में ,
भटके फिरते मारे -मारे कंकरीट के जंगल में,
धरती की छाती से जो भर -भर सोना उपजाते थे,
भूखे रह कर फुटपाथों पर रात काटते कंबल में ।

बना हुआ है इनका जीवन जीते जी ही नर्क है ।
है स्वतंत्र पर भारत माँ का जैसे बेड़ा गर्क है ।।3।।

भटकी हुई युवा पीढ़ी को आज जगाना ही होगा ,
कपटी रंगे सियारों से आजाद कराना ही होगा,
नई चेतना नव युग का आह्वान कराना ही होगा,
भारत के स्वर्णिम अतीत का पाठ पढ़ाना ही होगा ।

अभी नहीं पसली टूटी है, बस थोड़ा सा जर्क है ।
है स्वतंत्र पर भारत माँ का जैसे बेड़ा गर्क है ।। 4।।

कविता
डर लगता है
माँ ने पूछा अँधकार में क्यों बैठी हो
कौन गाँव से आइ हो किसकी बेटी हो ।
उठो अँधेरे से अब बाहर भी आजाओ
माँ से कैसा डरना सब कुछ सच बतलाओ ।१।

भूल गई माँ!! मैं तेरी ही परछांइ हूँ
मरियम नरगिस सीता हूँ तेरी जाई हूँ।
इस जग के दुःशासन- रावण के हाथों
नारी का सम्मान लुटा कर के आइ हूँ ।२।

बाहर कैसे आऊं माता वस्त्र हीन हूँ
धूल धूसरित काया है सामर्थ्य हीन हूँ ।
व्यभिचारी और कामी मनुवंशज के द्वारा
क्षत-विक्षत हूँ,आहत हूँ,शक्ती-विहीन हूँ।३।

चिरनिद्रा में सोने दे अँधे कोने में
अब तो जग के हर मानव सेडर लगता है।
अर्थहीन हो गए हैं अब राखी के धागे
मुझको हर रिश्ता एक आडम्बर लगता है।४।

नाम -लता यादव
शिक्षा -एम.ए.,बी. एस. सी., एल. टी.
(भावनाओं को कागज पर उकेरना अच्छा लगता है, व्यवसाय से शिक्षक हूँ, सैनिक परिवार से हूँ तो देश व सेना से विशेष लगाव)

1 thought on “गणतन्‍त्र दिवस पर लता के दो पुष्‍प।”

  1. रेखा दुबे कहते हैं:

    बहुत खूब

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