परिचर्चा: क्या कर सकते हैं आप? रीता जयहिंद हाथरसी

यदि कोई महिला हमें बेसहारा भूख से तड़पती हुई मिलती है तो मानवीयता का परिचय देते हुए सर्वप्रथम हमें उस बेसहारा महिला को भरपेट भोजन खिलाना चाहिए तत्पश्चात जब वो कुछ सामान्य सी हो जाए तो मानवीकरण के तौर पर उस महिला की पारिवारिक स्थिति जानकर पहली कोशिश ये करनी चाहिए कि यदि गृहक्लेश या पारिवारिक विवाद किसी भी प्रकार का है उसके संबंधों को सुधारकर उसके घर पर ही भिजवाएँ ।
यदि अन्य कोई Problems होती है तो उसके Solution की हमें पुरजोर कोशिश करनी चाहिए….
फिर भी यदि मामला नहीं सुलझता कोई उचित समाधान खोजकर उसका निवारण अत्यावश्यक है …
यदि हम एक अच्छे नागरिक हैं सच्चे भारतीय हैं तो हमें अपनी सँस्कृति को कायम रखने के लिए उस महिला की किस विषय में रुचि है तथा वो क्या कर सकने में सक्षम है किसी भी क्षेत्र में हम उसको रोजगार दिला सकते हैं ..
हमारी पहली कोशिश ये रहनी चाहिए कि उसे अपने आसपास ही कार्य जैसे हम अपने घर , मोहल्ले तथा समाज से शुरु कर सकते हैं ..
कमाना और पेट भरने के लिए मेहनत और मजदूरी ईमानदारी से करने में कभी झिझक महसूस नही होनी चाहिए …
आजकल शहरी वातावरण में तो हर फैमिली में काम करने वाली मेड से लेकर ब्यूटीशियन तथा बुटीक और फैक्टरी ऑफिस तथा स्कूल टीचर और स्कूल में भी आया की जरूरत रहती है…
इसके अलावा हम उस महिला की यदि कोई भी Help नहीं कर सकते क्योंकि कभी परिस्थितिवश इंसान मदद करना चाहते हुए भी Femily Problems के चलते मदद करने में असमर्थ हो तो कभी भी अपना घर खराब कर ऐसी समाजसेवा से बेहतर है कि उसे किसी सहयोगी सँस्थाएँ जो मानवीकरण की सहायतार्थ कार्य करती हैं जैसे महिला सशक्तिकरण , नारी निकेतन वृद्धाश्रभ यदि महिला बुजुर्ग है तो वहाँ व्यवस्था कर देनी चाहिए ..
यहाँ मैं एक बात का उल्लेख अवश्य करना चाहूँगी बेशक बात कुछ कड़ुवी हो सकती है पर सही व सच्ची है तथा आपको अच्छी लगेगी हमारे देश में अधिकतर महिला ही महिला की दुश्मन है …..यदि आप किसी महिला की मदद करना भी चाहेंगे तो आपकी ही पत्नी तथा घर के सदस्य आपको ताने देकर घर का माहौल बिगाड़ देंगे ….मुझे तो कहते हुए भी शर्म महसूस हो रही है कि यदि कोई पुरुष किसी बेसहारा भूख से तड़पती महिला की मदद करना भी चाहता है तो घर और समाज दोनों के शक के दायरे में आ जाता है …उसे महिला से अवैध तथा अनैतिक संबंध से लेकर कई तीखे व्यंग्य वाण के प्रहार सहने पड़ते हैं जिससे जो पुरुष हैल्प करना भी चाहते हैं …..तो जमाने की व समाज की परवाह कर कदम पीछे कर लेता है …ये बहुत शर्मसार बात है एक महिला की दूसरी महिला के लिए ऐसा दृष्टिकोण रखना …..यदि हम इसी जगह खुद को या अपनी घर परिवार की महिला की ऐसी स्थिति के कल्पना मात्र से ही सिहर जाते हैं तो दूसरे के लिए भी हमें दया भाव रखना होगा….. यही भारतीयता की तथा मानवीकरण की पहचान है …… आज किसी महिला पर संकट है तो कल किसी अपने परिवार की महिला पर भी संकट पड़ सकता है तथा देश हमारा है देश की बहन बेटी हमारी ही बहन बेटी है यदि ऐसी मानसिकता हम रखेंगे तो एक दिन वही भारत होगा जैसा हजारों साल पहले हुआ करता था…. हमें अपने जमीर को जगाना होगा तथा इंसानियत के नाते स्वधर्म निभाना होगा तभी हमारे देश में महिलाएँ सुरक्षित व आत्मनिर्भर होंगी और जब सभी महिलाओं को पुरुषों के बराबर काम करने का अधिकार मिलेगा तो महिलाएँ स्वावलंबी होंगी देश मजबूत बनेगा तथा महिलाओं को भूख से तड़पती देख सकने की नौबत नही आएगी ।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम…..देना चाहूँगी । धन्यवाद जी ।
*रीता जयहिंद हाथरसी* ( दिल्ली )

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