परिचर्चा: क्या कर सकते हैं आप? ममता देवी

भूख स्त्री या पुरुष नही होती है,क्यों कि भूख का कोई लिंग नहीं होता।भूख सिर्फ भूख होती है, जिसका संबंध सिर्फ पेट से होता है, फिर वह पेट चाहे स्त्री का हो या पुरुष का।भूख का शमन सिर्फ और सिर्फ रोटी से होता है।यह एक चौंकाने वाली बात है, कि लोग अक्सर आतंकवाद और युद्ध को मानव का सबसे बड़ा शत्रु मानतें हैं, किंतु यथार्थत: मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु उसकी भूख है,क्यों कि सबसे अधिक मौतें भूख के कारण होती है।
अब सवाल यह है, कि यदि इस भूख का संबंध किसी बेसहारा महिला से हो, तब क्या करेंगे आप ?परिचर्चा का विषय…. विषय की परिकल्पना.. और वह भी इतनी भयावह ! किंतु धरातलीय।उफ!एक साथ अगणित चीखें चीख मारकर चुप हो जाती हैं।किंतु फिर भी मन किसी अंतस्तल में जाकर अपने लिए सुकून का एक कोना तलाश ही लेता है,कि चलो… भूख का वर्ग-विभाजन ही हुआ, वर्ण-विभाजन नही..नही तो समस्या और अधिक विकराल हो सकती थी।
मैं जानती हूँ कि मैं अर्जुन नही हूँ,तो क्या हुआ!प्रयास करती हूँ कि स्वयं को चिड़िया की आँख पर ही केन्द्रित रखूँ।चिड़िया की आँख यानी कि भूख।स्पष्ट है कि मैं स्वयं को भूख पर ही केन्द्रित करूँगी और पूर्ण प्रयत्न करूँगी कि किस तरह अतिशीघ्र मैं उसकी भूख का शमन करूँ।अतः मैं सर्वप्रथम उस भूख से तड़पती बेसहारा महिला की भूख की तह तक जाना चाहूँगी जिसके अंतर्गत मैं उसकी शाब्दिक भाषा के साथ साथ शारीरिक भाषा के माध्यम से भी यह ज्ञात करने का प्रयत्न करूँगी कि उसकी भूख कितनी पुरानी है और किस तरह का भोजन उसके लिए सुपाच्य रहेगा।तत्पश्चात तात्कालिक प्रभाव से मैं उसकी भूख का हर सम्भव तरीके से अतिशीघ्र शमन करुँगी।
मैं एक मानव होने के साथ साथ इस देश की एक जिम्मेदार नागरिक भी हूँ।अतः मेरा दायित्व उसकी भूख के समाप्त होते ही समाप्त नही हो जाता।बल्कि यही तो वह बिंदु है, जहाँ से हमारे कुछ और दायित्वों का प्रारंभ होता है।भूख के चेहरे पर तुष्टि का भाव आते ही मैं उस बेसहारा महिला के धरातलीय दर्पण में झाँकने का प्रयत्न करूँगी,कि उसकी स्थिति और परिस्थिति क्या है?एक विवेकशील मानव होने के शिखर से बेसहारा की खाईं के मध्य गिरने के पड़ाव क्या हैं? मैं उन कारणों और पड़ावों तक पहुँच कर हर सम्भव उसकी समस्या का समाधान इस तरह से करने का प्रयास करूँगी कि पुनश्च उसे बेचारगी की शर्मिंदगी न उठानी पड़े।
भारत एक विकासशील देश है, विचारशून्य कंगाल देश नही,कि उसके पास अपने आखिरी नागरिक के लिए इतनी भी व्यवस्था न हो, कि उसका पेट भरा जा सके,कि वह अपने अन्तिम नागरिक के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था भी उपलब्ध न करा सके।अनेकानेक ऐसी योजनाएं हैं, जो कमजोर कड़ियों को मजबूती से जोड़ती हैं।मैं अपने सीमित संसाधनों से उन योजनाओं की जानकारी एकत्रित कर उनके माध्यम से पुनश्च उस बेसहारा महिला को देश की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास करूँगी।
मैं उस बेसहारा महिला के मानसिक स्तर से सामन्जस्य स्थापित कर उसकी राष्ट्रीय चेतना को समझने का प्रयत्न भी करुँगी।तत्पश्चात स्थिति की आवश्यकतानुसार उसमें कुछ नव बीजारोपण कर उसे अनुभूत कराने का प्रयत्न करूँगी कि राष्ट्र के विकास के लिए उसका स्वयं का मजबूत होना कितना आवश्यक है,कि वह भी देश के विकास की श्रंखला की कितनी अहम कड़ी है, कि किसी भी श्रंखला की मजबूती के लिए उसकी प्रत्येक कड़ी का मजबूत होना कितना आवश्यक होता है, कि किसी भी एक कड़ी का कमजोर होना उस श्रृंखला के लिए कितना घातक हो सकता है, कि क्या उसे स्वीकार्य होगा यह घातक कड़ी वह स्वयं हो?मैं उसके मानसिक स्तर का सम्बल बनूँगी और हर सम्भव उसकी मदद कर प्रयत्न करूँगी कि उसके बेसहारा होने की बैशाखी को तोड़कर सदैव के लिए फेंक दूँ, ताकि वह भी राष्ट्र के अधरों की मुस्कान का एक हिस्सा बन सके।
    ममता देवी
प्रवक्ता… अंग्रेजी
राजकीय बालिका इण्टर कालेज, उन्नाव
सम्पर्क सूत्र..9450344566

1 thought on “परिचर्चा: क्या कर सकते हैं आप? ममता देवी”

  1. अतुल तिवारी कहते हैं:

    बहुत खूब , बेहतरीन लेख , यथार्थपरक लेख

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