आखिर हो ही गई व्‍यंग्‍य की चौपाल, माना नहीं कोई।

नई दिल्‍ली। पुस्‍तक मेले में 13 जनवरी को व्यंग्य की चौपाल थी. पहला बढ़िया काम ये हुआ कि जिस युवा लेखक (शशिकांत सिंह ) को पुरस्कार मिलना था , उसकी गाड़ी रद्द् हो गयी। वह नहीं आए। फिर .कार्यक्रम के ऐन पहले अध्यक्ष (डा हरीश नवल )का फोन आ गया कि नहीं आ पाऊंगा। कार्यक्रम स्थल पहुंचे ,पता चला की बैनर खो गए।बिना बैनर प्रोग्राम करना तय हुआ। कार्यक्रम का समय हो गया ,पर संचालक ( डा रमेश तिवारी) नहीं आये (खैर 10 मिनट बाद आ गए , सब सँभाल भी लिया) । कुछ देर में व्यंग्यकारों , पाठको का आवागमन शरू हो गया। कौन आये – पहले दिल्ली से बाहर से आये मित्र – डा हरि जोशी ( भोपाल ),रमेश सैनी ( जबलपुर ),गिरीश पंकज (रायपुर ) दिलीप तेतरबे (रांची ) अनुज खरे (भोपाल )अमिताभ सक्सेना (दुबई ),संदीप नैय्यर (लन्दन ),हरसिमरत कौर कौर (लुधियाना ) बलदेव त्रिपाठी (लखनऊ ) डा नीरज शर्मा (बिजनौर) )डा सुधीर शर्मा (रायपुर) डा गिरिराजशरण अग्रवाल ( गुड़गांव ) आदि। दिल्ली और आसपास से सर्वश्री डा सुरेश कांत ,कमलेश पांडे ,सुभाष नीरव ,डा राजेश कुमार,रामकिशोर उपाध्याय ,नीरज बधवार,संतोष त्रिवेदी ,बृजमोहन ,शर्मा ,एम एम चंद्रा , छत्र छाजेड़ ,अर्चना चतुर्वेदी ,नीलोत्पल मृणाल ,सुषमा भंडारी ,तारा गुप्ता ,प्रवीण कुमार ,लुबना ग़ज़ल , सुनील चतुर्वेदी , वैभव , कृष्ण द्विवेदी ,अभिषेक अभी ,शब्द मसीहा ,सरिता भाटिया आदि। कार्यक्रम की अध्यक्षता डा सुरेश कांत ने और मंच पर विशिष्ट अतिथि का कार्य डा हरि जोशी ( भोपाल ),डा गिरिराज शरण अग्रवाल ,रमेश सैनी ,गिरीश पंकज,दिलीप तेतरबे ने वहन किया। संचालन डा रमेश तिवारी जी ने किया।
lचौपाल के संयोजक सुभाष चंदर ने चौपल के उद्देश्यो पर प्रकाश डाला ,यह भी बताया की यह व्यंग्य चर्चा का देश का एकमात्र खुला मंच है.. युवा व्यंग्यकार अर्चना चतुर्वेदी ने कार्यक्र्म की रूपरेखा और सम्मान पर प्रकाश डाला।साथ ही स्व. डा किशोरीलाल चतुर्वेदी सम्मान के विषय में जानकारी दी। उसके बाद शशिकांत के प्रतिनिधि को स्मृति ,शाल ,धनराशि, श्रीफल देकर युवा व्यंग्यकार सम्मान से सम्मानित किया गया।
इसके बाद प्रारम्भ हुई -चौपाल में जिन बिंदुओं पर चर्चा हुई ,वे थे। .
, (१)डिजिटल मीडिया -वनलाइनर ,लघु व्यंग्यों की चुनौती को गंभीरता से लिया जाए , २.) व्यंग्य पुरस्कारो की राजनीति ३ ) बेहतर रचना की कमी ४) सरोकारो पर केन्द्रित होना

1 thought on “आखिर हो ही गई व्‍यंग्‍य की चौपाल, माना नहीं कोई।”

  1. अरुण अर्णव खरे कहते हैं:

    ये अपनी तरह का विशिष्ट आयोजन है जिसमें व्यंग्य पर सार्थक चर्चा होती है । पिछले वर्ष मैं भी इस आयोजन का प्रत्यक्षदर्शी था .. आयोजकों को बधाई

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