परिचर्चा:आखिर क्यों सताई जाती हैं-डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

शिव पुराण के अनुसार शिव-शक्ति का संयोग ही परमात्मा है और हिंदू धर्म में यह मान्यता भी है कि ब्रह्मांड की सार्वभौमिक ऊर्जा स्त्रीलिंग ही है और यही सम्पूर्ण सृष्टि की जीवन शक्ति है। भारतवर्ष के पुरातन इतिहास एवं धर्मग्रंथों के अनुसार भी भारतीय समाज ने कभी नारी के महत्व का कम आकलन नहीं किया। लेकिन इन सबके पश्चात भी समाज पुरुष प्रधान ही रहा। श्रीराम द्वारा सीता का परित्याग, गांधारी का अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लेना, ‘पुत्रवती भवः’ का आशीर्वाद, आदि कई उदाहरण हैं जिनमें नारी को दोयम दर्जे का माना गया। कुछ समुदायों में सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह पर रोक सामाजिकता एक भाग बन गये, साथ ही देवदासी, पर्दा और जौहर प्रथाओं द्वारा महिलाओं को शोषण का शिकार होना पड़ा। चाहे नारी जयशंकर प्रसाद जी  की “केवल श्रद्धा” हो, एलेक्जेंडर स्मिथ के “ईश्वर के सामने खड़ा हूँ” शब्दों में ईश्वरीय या फिर महर्षि वाल्मीकि द्वारा श्री राम के “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” मन्त्र में सम्मानित हो, जब बात पारिवारिक गरीबी की आती है, तब दृष्टि बदलते समय नहीं लगता। कुदृष्टि केवल पुरुष की ही नहीं महिलाओं की भी होती है, जो गरीब माता-पिता को टोकती रहती है कि लड़की के पालन-पोषण कहाँ धन खर्च करोगे, इसकी बजाय शादी ही कर दो। आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियों और अभद्रता से दूर रखने के लिए कई गरीब माता-पिता अपनी बेटी का विवाह शिक्षित होने से पूर्व ही कर देते हैं और यदि बाद में भी करते हैं तो भी शिक्षा से तो वंचित रखते ही हैं।  शादी के पश्चात् भी कुशिक्षा (केवल अशिक्षा या अजागरूकता नहीं) के कारण, कई महिलाओं को, विशेष तौर पर गरीब घरों की महिलाओं को, कई प्रकार के शोषण और प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ता है। उदाहरणस्वरूप घर से बाहर नहीं निकलना, बीमारी में चिकित्सक के पास नहीं जाना, कन्या भ्रूण हत्या, आदि और यदि किसी कारणवश पति की असमय मृत्यु हो जाए तो अधिकतर विधवाओं को मनहूस मान कर अन्य महिलायों और बच्चों से भी दूर कर दिया जाता है। आस्था और अंधविश्वास के बीच बहुत बारीक लकीर होती है। भोपों/तांत्रिकों के अनुसार जिन्हें भी डायन माना गया है, उनका सर्वे करें तो उनमें से अधिकतर ऐसी विधवाएं ही मिलेंगी, जो असहाय हैं। ऐसे मामले केवल शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना तक ही सीमित नहीं हैं, अन्धविश्वास का यह व्यवसाय महिलाओं की जान तक लेने से नहीं हिचकता।  समाज से अलग-थलग हो विधवा महिलायें जिनका जीवन पुरुषों के भरोसे चल रहा था, का कई बार ससुराल में ही यौन शोषण कर लिया जाता है। वे भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक यातनाओं से गुजरती हुई अक्सर विषाद का शिकार हो जाती हैं और इन सबसे बचने के लिए उनमें से कई कमज़ोर होकर आत्महत्या तक को मजबूर हो जाती हैं। एक क्षण को क्या हम यह सोच सकते हैं कि यह सब घटनाएँ उस देश में घटित हो रही है जिसमें कुछ दिनों बाद बुलेट ट्रेन चलने वाली है?यदि स्थिति सुधारने को सोचें तो सर्वप्रथम समाज में से रूढ़ियों, अंधविश्वास और अंध-अविश्वास की कुशिक्षा को समाप्त करना होगा। किसी न किसी कौशल से शिक्षित कर ऐसी महिलाओं को घर से बाहर निकल कर रोजगार सृजन के लिए भी प्रेरित करना होगा। गरीब परिवारों से आई हुई विधवा महिलायें अपने परिवार, समुदाय और समाज में तभी सम्मानपूर्वक रह सकती हैं, जब वे स्वयं को सामाजिक, आर्थिक व मानसिक रूप से स्वतंत्र रख पाने में सक्षम हों। यह ज़रूर ध्यान रखें कि स्वतंत्रता का अर्थ स्वछंदता कदापि नहीं हुआ, स्वतंत्रता शिक्षा है और स्वच्छंदता कुशिक्षा। सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थाएं यदि बचपन ही से उचित शिक्षा दे पायें तो उससे बेहतर कुछ भी नहीं है। फ़रवरी 2016 में झारखंड में 14 वर्ष की एक लड़की ममता ने कम उम्र में शादी से इनकार कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया और बाद में सरकार ने भी उसकी आर्थिक सहायता की, समाज ने भी सराहना की। कालिदास ने रघुवंश में लिखा है `जगत: पितरौ वंदे पार्वती परमेश्वरौ’। नर-नारी को समान रखने में ही समाज की प्रगति है। ममता की तरह ही यदि सभी जागरूक होकर अशिक्षा तथा कुशिक्षा मिटाने का संकल्प करें तब ही सामजिक और आर्थिक सकारात्मक उत्थान संभव हो पायेगा।

: डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

6 thoughts on “परिचर्चा:आखिर क्यों सताई जाती हैं-डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी”

  1. अतुल कुमार कहते हैं:

    बहुत अच्छी जानकारी

  2. Nidhi Vyas कहते हैं:

    //ब्रह्मांड की सार्वभौमिक ऊर्जा स्त्रीलिंग ही है और यही सम्पूर्ण सृष्टि की जीवन शक्ति है// – कितनी सुंदर बात लिखी है और सच भी

  3. मनोज शिवदासानी कहते हैं:

    कुशिक्षा वाली बात बहुत पसंद आई, कुछ नया रखा आपने.

  4. Hansraj shukla कहते हैं:

    बढ़िया और ज्ञानवर्धक आलेख

  5. जिनेन्द्र खतूरिया कहते हैं:

    //आस्था और अंधविश्वास के बीच बहुत बारीक लकीर होती है।// – बहुत गूढ़ बात…

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