परिचर्चा-: आखिर क्यों सताई जाती है- डा0 हंसा शुक्‍ला

आर्थिक स्थिति से कमजोर परिवार में माता-पिता का सपना होता है कि लड़की की शादी अपने से अच्छे परिवार में करें जिससे लड़की ब्याह के बाद अच्छा जीवन व्यतीत कर सके। इसलिये माता-पिता अपने हैसियत से ज्यादा खर्च कर अपनी बेटी की शादी अपने से अच्छे आर्थिक स्थिति वाले परिवार में करते हैं।
ससुराल में बहु के रूप में इस लड़कियों को स्वीकार तो किया जाता है लेकिन पूरे मन से नहीं। इनकी सभी खुबियों को नजरअंदाज कर हर एक कमीं को गिनाया जाता है। पति के रहते लड़की सबकुछ सहन करती है, क्योंकि उसे अपने जीवनसाथी का सहारा होता है। पति के मृत्यु के बाद अधिकांष प्रकरणों में देखा गया है कि बहु को घर में परिवार के सदस्य का दर्जा नहीं दिया जाता, बल्कि उसे सिर्फ इसलिये रखा जाता है कि उससे घर का पूरा काम कराया जाये। अधिकांषतः ससुराल वालों की मंषा यह भी होती है कि बहु अगर मायके चली जाये या अलग रहे तो कानुनन उसे जायदाद में हिस्सा देना होगा, इसलिये अधिकतर परिवार में तो यह कोषिष होती है कि विधवा बहु की षादी विधुर जेठ या कुंआरे देवर से करा दी जाये, जिससे बहु को संपत्ति में अलग से हिस्सा न देना पड़े। बहु द्वारा विवाह का विरोध करने पर पाया गया है कि कभी उनके ऊपर चारित्रिक आरोप भी लगाया जाता है, कभी पुरूश सदस्यों की मंषा पूरी न होने पर उन्हे टोनही करार दिया जाता है।
गरीब घरों में विधवा बहु के प्रति नजरिया नकारात्मक हो जाता है, उसे घर का सदस्य नही बल्कि घर के लिये बोझ समझा जाता है। एक कारण यह भी होता है कि गरिब परिवार में आये उर्पाजन के साधन कम होते है, इसलिये बेटे के न रहने पर बहु उनहे बोझ लगती है। बोझ लगने के कारण उनको सताया जाता है, बात-बात में इनहे महसूस, पति को खा जाने वाली कुलटा कहा जाता है। इन स्थितियों में कभी-कभी विधवा आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने को मजबुर हो जाती है।
विधवा होना किसी लड़की के लिये सबसे बड़ा दुख होता है। उम्र चाहे जो भी हो लेकिन जीवन के सफर में हमसफर का साथ छोड़कर चले जाना पत्नी के लिये वह कमी होती है जिसे किसी दूसरे रिष्ते से पूरा नहीं किया जा सकता है। पति की मृत्यु पर परिवार वालों को बहु को संबल देना चाहिये न कि उसका शोषण  करना चाहिये ।
ससुराल वालों को इनके लिये स्वरोजगार के साधन उपलब्ध करा देने चाहिये जैसे- घर में ट्यूषन, सिलाई-कढ़ाई, हस्तनिर्मित सामान जैसे पापड़, आचार आदि बनाना और बेचना। इससे उनका मन काम में लगा रहेगा और आय भी हो जायेगी।
किसी इंसान की मृत्यु ईष्वर का विधान होता है इस सच को स्वीकार करते हुये बेटे के ना रहने पर बहु को भावनात्मक संबल देना चाहिये उसे आर्थिक रूप से मजबूत बनाने हेतु प्रयास करना चाहिये एवं यदि लड़की की षिक्षा पूरी नही हो पाई है तो उसे षिक्षा पूरी करने हेतु प्रेरित करना चाहिये। जिससे वह परिवार में सहजता से अपना षेश जीवन व्यतीत कर सकें कभी उसके मन में यह भावना आये की वह परिवार के लिये बोझ है बल्कि उसे यह एहसास हो कि वह परिवार का अभिन्न अंग है।

डॉ. हंसा शुक्ला
प्राचार्य
स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाविद्यालय
आमदी नगर हुडको, भिलाई

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