परिचर्चा:आखिर क्यों सताई जाती हैं- इंजी. आशा शर्मा

गरीबी अपने आप में ही एक अभिशाप है. एक प्रचलित कहावत है- “गरीब की लुगाई,गाँव की भौजाई…” यह कहावत समाज में पैसे की शक्ति को दर्शाती है. यानि यदि किसी के पास रुपया-पैसा नहीं हो तो उस पर कोई भी अपना अधिकार जमा सकता है. इसे दूसरे शब्दों में इस तरह भी कहा जा सकता है कि पैसे में वो ताकत है जो किसी को भी झुकने के लिए मजबूर  कर सकती है. पैसे के लिए कहा भी जाता है कि- “माना तू ख़ुदा नहीं है… मगर कसम से, ख़ुदा से कम भी नहीं है…” यही बात गरीब की बेटी पर भी लागू होती है. और अगर ख़ुदा न खास्ता वह विधवा हो जाये तो कोढ़ में खाज वाला काम हो जाता है. पति का शाब्दिक अर्थ है- मालिक… और विधवा होना यानि बिना मालिक की सम्पत्ति पति के न रहने पर महिला की स्थिति ससुराल में दोयम दर्जे की हो जाती है क्योंकि उसका पक्ष लेने वाला… उसका साथ देने वाला साथी अब नहीं रहा. ऐसी स्थिति में मुश्किल घड़ी आने पर उसका एकमात्र सहारा उसका मायका होता है जिसकी तरफ वह आशा भरी निगाहों से देखती
है. मगर बिना पैसे के वहां से भी उसे कोई मदद नहीं मिलती. यदि कोई उसका साथ देना भी चाहे तो उसे गरीबी का ताना देकर दबा दिया जाता है. लड़की के अपनी ससुराल में टिके रहने की मजबूरी भी ससुराल वालों को उसे सताने के
लिए उकसाती है क्योंकि मायका गरीब होने के कारण वह ससुराल छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाती. हिम्मत की छोडिये वह तो इस तरह की धमकी भी नहीं दे पाती. निवारण प्रत्येक व्यक्ति स्वभाव और आचरण में एक-दूसरे से भिन्न होता है. सत्य यह भी है कि मनुष्य अपनी आदतें बदल सकता है मगर स्वभाव नहीं… ऐसे में लड़की को अपने ससुराल के  परिवार में ऐसे व्यक्ति की पहचान करनी चाहिए जो स्वभाव से सज्जन और उदार स्वभाव वाला हो. लड़की को अपनी परेशानियाँ ऐसे व्यक्ति से साझा करके उससे उचित परामर्श लेना चाहिए. लड़की को विधवा होने के बाद भी ससुराल में अपने हक़ के लिए दावेदारी मजबूत रखनी चाहिए. बेशक इसमें उसे मायके से कोई सहारा नहीं मिलेगा मगर उसे अपना आत्मविश्वास कायम रखना होगा तभी वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का मुकाबला कर पायेगी. परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत हो, लड़की यदि आत्मनिर्भर हो तो आधी से ज्यादा परेशानियाँ स्वत: ही मिट जाती हैं इसलिये लड़कियों का शिक्षित और अपने पैरों पर खड़ा होना आवश्यक है. विधवा होने के बाद तो यह और भी जरुरी है. इसका एक लाभ यह भी होगा कि व्यस्त रहने के कारण अनावश्यक बातों की तरफ ध्यान कम जाएगा और दिमाग शांत रहेगा. सलाह  पीहर पक्ष रूपये-पैसे से न सही मगर लड़की को आत्मिक बल का सहारा अवश्य दे. उसकी परेशानी का हल उनके पास हो या न हो, कम से कम उसका दुःख-दर्द बाँट तो सकते ही हैं. कहते हैं कि लड़कियां अपनी माँ के सबसे अधिक करीब होती हैं इस दृष्टि से भी दुःख या परेशानी के समय मायके वालों का मानसिक सहारा बहुत बड़ा संबल होता है, इसे बनाये रखें. लड़कियों को चाहिए कि वे ससुराल के प्रति अपने कर्तव्यों के पालन में किसी तरह की कोताही न बरतें. पति के न रहने पर भी पति के रिश्तेदारों के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाये और ससुराल में अपने आप को स्थापित करने की कोशिश करें क्योंकि यह तो तय है कि गरीब घर की लड़की को विधवा होने के बाद ससुराल में ही रहना होगा. यदि ससुराल में प्रताड़ना मिल रही हो तो लड़कियों को इसे किसी भी सूरत में सहन करने की सलाह नहीं दी जा सकती. उन्हें ये बात अपने परिजनों या किसी करीबी को अवश्य बतानी चाहिए. आवश्यकता पड़ने पर पुलिस, महिला आयोग आदि की मदद लेने से परहेज नहीं
करना चाहिए. अंत में एक बात…. न झुकें… न डरें… और ना ही किसी के दबाव में आकर अपना आत्मविश्वास खोयें… बस बढ़े चलें…. निरंतर…लक्ष्य की ओर

इंजी. आशा शर्मा
A- 123, करणी नगर (लालगढ़)
बीकानेर- 334001
9413359571

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